Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୩୬ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୭୭
पुनश्चोक्तं श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवैः मोक्षप्राभृते — ‘‘अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाऊण लहहिं
इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुदा णिव्वुदिं जंति ।।’’ । अयमत्र भावार्थः । यथादित्रिकसंहनन-
लक्षणवीतरागयथाख्यातचारित्राभावेऽपीदानीं शेषसंहननेनापि शेषचारित्रमाचरन्ति तपस्विनः
तथादिकत्रिकसंहननलक्षणशुक्लध्यानाभावेऽपि शेषसंहनेनापि शेषचारित्रमाचरन्ति तपस्विनः तथा
त्रिकसंहननलक्षणशुक्लध्यानाभावेऽपि शेषसंहनेनापि संसारस्थितिच्छेदकारणं परंपरया मुक्ति कारणं
च धर्मध्यानमाचरन्तीति ।।३६।।
ଅନ୍ଯୋନେ ଆଚରୋ. ଵଳୀ ମୋକ୍ଷପ୍ରାଭୃତ (ଗାଥା ୭୭)ମାଂ ଶ୍ରୀକୁଂଦକୁଂଦାଚାର୍ଯଦେଵେ ପଣ କହ୍ଯୁଂ ଛେ କେ –
‘‘अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाऊण लहहिं इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुदा णिव्वुदिं जंति ।’’
(ଅର୍ଥ: — ଆଜେଯ (ଆ ପଂଚମକାଳମାଂ ପଣ) ଵିମଳତ୍ରିରତ୍ନମୁନିଓ (ଶୁଦ୍ଧ ରତ୍ନତ୍ରଯଵାଳା
ମୁନିଓ, ରତ୍ନତ୍ରଯ ଵଡେ ଶୁଦ୍ଧ ଏଵା ମୁନିଓ) ଆତ୍ମାନୁଂ ଧ୍ଯାନ କରୀନେ ଇନ୍ଦ୍ରପଦନେ ପାମେ ଛେ
ଅଥଵା ଲୋକାନ୍ତିକଦେଵ ଥାଯ ଛେ ଅନେ ତ୍ଯାଂଥୀ ଚ୍ଯଵୀ (ମନୁଷ୍ଯ ଥଈନେ) ମୋକ୍ଷେ ଜାଯ ଛେ.
ଅହୀଂ, ଆ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ କେ ଆଦିନା ତ୍ରଣ ସଂହନନଵାଳା ଵୀତରାଗ ଯଥାଖ୍ଯାତ ଚାରିତ୍ରନା
ଅଭାଵମାଂ ପଣ ଆଜେଯ ତପସ୍ଵୀଓ ବାକୀନା ସଂହନନ ଵଡେ (ଯଥାସଂଭଵ) ବାକୀନାଂ ଚାରିତ୍ରନେ
ଆଚରେ ଛେ ତଥା ପହେଲା ତ୍ରଣ ସଂହନନଵାଳା ଶୁକ୍ଲଧ୍ଯାନନା ଅଭାଵମାଂ ପଣ ବାକୀନାଂ ସଂହନନ
ଵଡେ ସଂସାରସ୍ଥିତିନେ ଛେଦଵାନୁଂ କାରଣ ଅନେ ପରଂପରାଏ ମୁକ୍ତିନୁଂ କାରଣ ଏଵୁଂ ଧର୍ମଧ୍ଯାନ ଆଚରେ
ଛେ. ୩୬.
करो । फि र श्रीकुंदकुंदाचार्यने भी मोक्षपाहुड़में ऐसा ही कहा है ‘‘अज्ज वि’’ उसका तात्पर्य
यह है, कि अब भी इस पंचमकालमें मन, वचन, कायकी शुद्धतासे आत्माका ध्यान करके
यह जीव इन्द्र पदको पाता है, अथवा लौकांतिकदेव होता है, और वहाँसे च्युत होकर
मनुष्यभव धारण करके मोक्षको पाता है । अर्थात् जो इस समय पहलेके तीन संहनन तो
नहीं हैं, परंतु अर्धनाराच, कीलक, सूपाटिका, ये आगेके तीन हैं, इन तीनोंसे सामायिक
छेदोपस्थापनाका आचरण करो, तथा धर्मध्यानको आचरो । धर्मध्यानका अभाव छहों संहननोंमें
नहीं है, शुक्लध्यान पहलेके तीन संहननोंमें ही होता है, उनमें भी पहला पाया (भेद)
उपशमश्रेणीसंबंधी तीनों संहननोंमें है, और दूसरा, तीसरा, चौथा पाया प्रथम संहननवाले ही
के होता है, ऐसा नियम है । इसलिये अब शुक्लध्यानके अभावमें भी हीन संहननवाले इस
धर्मध्यानको आचरो । यह धर्मध्यान परम्पराय मुक्तिका मार्ग है, संसारकी स्थितिका छेदनेवाला
है । जो कोई नास्तिक इस समय धर्मध्यानका अभाव मानते हैं, वे झूठ बोलनेवाले हैं, इस
समय धर्मध्यान है, शुक्लध्यान नहीं है ।।३६।।