Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୪୩ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୮୭
तत्त्वातत्त्वं मत्वा मनसि ये स्थिताः समभावे
ते परं सुखिनः अत्र जगति येषां रतिः आत्मस्वभावे ।।४३।।
तत्तातत्तु इत्यादि तत्तातत्तु मुणेवि अन्तस्तत्त्वं बहिस्तत्त्वं मत्वा क्व मणि मनसि
जे ये केचन वीतरागस्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानिनः थक्का स्थिता क्व सम-भावि परमोशमपरिणामे
ते पर त एव सुहिया सुखिनः इत्थु जगि अत्र जगति के ते जहं रइ येषां रतिः
क्व अप्प-सहावि स्वकीयशुद्धात्मस्वभावे इति तथाहि यद्यपि व्यवहारेणानादिबन्धनबद्धं
तिष्ठति तथापि शुद्धनिश्चयेन प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशबन्धरहितं, यद्यप्यशुद्धनिश्चयेन स्वकृत-
शुभाशुभकर्मफ लभोक्त ा तथापि शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन निजशुद्धात्मतत्त्वभावनोत्थवीतरागपरमानन्दैक-
सुखामृतभोक्त ा, यद्यपि व्यवहारेण कर्मक्षयानन्तरं मोक्षभाजनं भवति तथापि शुद्धपारिणामिक-
परमभावग्राहकेण शुद्धद्रव्यार्थिकनयेन सदा मुक्त मेव, यद्यपि व्यवहारेणेन्द्रियजनितज्ञानदर्शनसहितं
ଭାଵାର୍ଥ:ଜୋକେ ଆ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ ଅନାଦିକାଳଥୀ ବଂଧନଥୀ ବଂଧାଯେଲୋ ଛେ
ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ପ୍ରକୃତି, ସ୍ଥିତି, ଅନୁଭାଗ, ପ୍ରଦେଶ ଏ ଚାର ପ୍ରକାରନା ବଂଧଥୀ ରହିତ ଛେ,
ତଥା ଅଶୁଦ୍ଧନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ସ୍ଵପ୍ରକୃତ (ପୋତେ ଉପାର୍ଜନ କରେଲା) ଶୁଭ-ଅଶୁଭ କର୍ମନା ଫଳନୋ ଭୋକ୍ତା
ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯଥୀ ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ ଭାଵନାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଏକ (କେଵଳ) ଵୀତରାଗ
ପରମାନଂଦରୂପ ସୁଖାମୃତନୋ ଭୋକ୍ତା ଛେ, ତେମଜ ଵ୍ଯଵହାରନଯଥୀ କର୍ମନା କ୍ଷଯ ଟାଣେ ଜ ମୋକ୍ଷନୁଂ ଭାଜନ
ଥାଯ ଛେ ତୋପଣ ଶୁଦ୍ଧ ପାରିଣାମିକ ପରମଭାଵଗ୍ରାହକ ଶୁଦ୍ଧଦ୍ରଵ୍ଯାର୍ଥିକନଯଥୀ ସଦା ମୁକ୍ତ ଜ ଛେ, ଜୋ-
गाथा४३
अन्वयार्थ :[ये ] जो कोई वीतराग स्वसंवेदन प्रत्यक्षज्ञानी जीव [तत्त्वातत्त्वं ]
आराधने योग्य निज पदार्थ और त्यागने योग्य रागादि सकल विभावोंको [मनसि ] मनमें
[मत्वा ] जानकर [समभावे स्थिताः ] शांतभावमें तिष्ठते हैं, और [येषां रतिः ] जिनकी लगन
[आत्मस्वभावे ] निज शुद्धात्म स्वभावमें हुई है, [ते परं ] वे ही जीव [अत्र जगति ] इस
संसारमें [सुखिनः ] सुखी हैं
भावार्थ :यद्यपि यह आत्मा व्यवहारनयकर अनादिकालसे कर्मबंधनकर बँधा है, तो
भी शुद्धनिश्चयनयकर प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेशइन चार तरहके बंधनोंसे रहित है,
यद्यपि अशुद्धनिश्चयनयसे अपने उपार्जन किये शुभ-अशुभ कर्मोंके फ लका भोक्ता है, तो भी
शुद्धद्रव्यार्थिकनयसे निज शुद्धात्मतत्त्वकी भावनासे उत्पन्न हुए वीतराग परमानंद सुखरूप
अमृतका ही भोगनेवाला है, यद्यपि व्यवहारनयसे कर्मोंके क्षय होनेके बाद मोक्षका पात्र है,
तो भी शुद्ध पारिणामिक परमभावग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिकनयसे सदा मुक्त ही है, यद्यपि