Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୪୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୮୯
अस्त्यात्मानादिबद्धः स्वकृतजफ लभुक् तत्क्षयान्मोक्षभाजी । ज्ञाताद्रष्टा स्वदेहप्रमितिरुपसमाहार-
विस्तारधर्मा । ध्रौव्योत्पत्तिव्ययात्मा स्वगुणयुत इतो नान्यथा साध्यसिद्धिः’’ ।।४३।।
अथ योऽसावेवोपशमभावं करोति तस्य निन्दाद्वारेण स्तुतिं त्रिकलेन कथयति —
१७०) बिण्णि वि दोस हवंति तसु जो सम – भाउ करेइ ।
बंधु जि णिहणइ अप्पणउ अणु जगु गहिलु करेइ ।।४४।।
द्वौ अपि दोषौ भवतः तस्य यः समभावं करोति ।
बन्धं एव निहन्ति आत्मीयं अन्यत् जगद् ग्रहिलं करोति ।।४४।।
ज्ञाताद्रष्टा स्वदेहप्रमितिरुपसमाहारविस्तार धर्मा ।
ध्रौव्योत्पत्तिव्ययात्मा स्वगुणयुत इतो नान्यथा साध्यसिद्धिः ।।’’
(ସିଦ୍ଧଭକ୍ତି-୨)
(ଅର୍ଥ: — କୋଈ ପୋତାନୋ କେ ପୋତାନା ଗୁଣନୋ ଅଭାଵ କରଵା ମାଟେ ତପଶ୍ଚର୍ଯାଦି ଵିଧିନୀ ପ୍ରଵୃତ୍ତି
କରେ ଜ ନହି.
ଆତ୍ମା ଅନାଦିଥୀ କର୍ମୋ ଵଡେ ବଂଧାଯେଲୋ, ପୋତେ ଉପାର୍ଜେଲା ଶୁଭାଶୁଭ କର୍ମନୋ ଭୋକ୍ତା ତେନା
କ୍ଷଯଥୀ ମୋକ୍ଷନୋ ଭୋକ୍ତା, ଜ୍ଞାତା-ଦ୍ରଷ୍ଟା,ସଂସାର-ଅଵସ୍ଥାମାଂ ସ୍ଵଦେହ ପ୍ରମାଣରୂପ, ସଂକୋଚ-
ଵିସ୍ତାରନା ସ୍ଵଭାଵଵାଳୋ, ଉତ୍ପାଦ ଵ୍ଯଯଧ୍ରୌଵ୍ଯସ୍ଵରୂପ ଅନେ ପୋତାନା ଗୁଣଥୀ ଯୁକ୍ତ ଛେ, ଆଵା
ସ୍ଵରୂପେ ଆତ୍ମାନେ ଜାଣଵାଥୀ ସାଧ୍ଯନୀ ସିଦ୍ଧି ଛେ, ଅନ୍ଯ ପ୍ରକାରେ ଜାଣଵାଥୀ ସାଧ୍ଯନୀ ସିଦ୍ଧି ଥତୀ
ନଥୀ. ୪୩.
किये हुए कर्मोंके फ लका भोक्ता है, उन कर्मोंके क्षयसे मोक्षपदका भोक्ता है, ज्ञाता है,
देखनेवाला है, अपनी देहके प्रमाण हैं, संसार – अवस्थामें प्रदेशोंके संकोच विस्तारको धारण
करता हैं, उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य सहित है, और अपने गुण पर्याय सहित है । इसप्रकार आत्माके
जाननेसे ही साध्यकी सिद्धि है, दूसरी तरह नहीं है ।।४३।।
आगे जो संयमी परम शांतभावका ही कर्ता है, उसकी निंदा द्वारा स्तुति तीन गाथाओंमें
करते हैं —
गाथा – ४४
अन्वयार्थ : — [यः ] जो साधु [समभावं ] राग-द्वेषके त्यागरूप समभावको
[करोति ] करता है, [तस्य ] उस तपोधनके [द्वौ अपि दोषौ ] दो दोष [भवतः ] होते हैं ।