Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୪୮ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୨୯୭
१७५) भणइ भणावह णवि थुणइ णिदह णाणि ण कोइ ।
सिद्धिहिँ कारणु भाउ समु जाणंतउ पर सोइ ।।४८।।
भणति भाणयति नैव स्तौति निन्दति ज्ञानी न कमपि ।
सिद्धेः कारणं भावं समं जानन् परं तमेव ।।४८।।
भणइ इत्यादि । भणइ भणति नैव भणावह नैवान्यं भाणयति न भणन्ते प्रेरयति णवि
थुणइ नैव स्तौति णिदह णाणि ण कोइ निन्दति ज्ञानी न कमपि । किं कुर्वन् सन् । सिद्धिहिं
कारणु भाउ समु जाणंतउ पर सोइ जानन् । कम् । परं भावं परिणामम् । कथंभूतम् । समु
समं रागद्वेषरहितम् । पुनरपि कथंभूतं कारणम् । कस्याः । सिद्धेः परं नियमेन सोइ तमेव
सिद्धिकारणं परिणाममिति । इदमत्र तात्पर्यम् । परमोपेक्षासंयमभावनारूपं विशुद्धज्ञानदर्शननिज-
शुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुभूतिलक्षणं साक्षात्सिद्धिकारणं कारणसमयसारं जानन् त्रिगुप्ताव-
स्थायां अनुभवन् सन् भेदज्ञानी पुरुषः परं प्राणिनं न भणति न प्रेरयति न स्तौति न च
निन्दतीति ।।४८।।
ଭାଵାର୍ଥ: — ପରମ ଉପେକ୍ଷାସଂଯମନୀ ଭାଵନାରୂପ ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନଦର୍ଶନଵାଳା ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମ-
ତତ୍ତ୍ଵନାଂ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ ସମ୍ଯଗ୍ଅନୁଭୂତି ଜେନୁଂ ସ୍ଵରୂପ ଛେ ଏଵା ସାକ୍ଷାତ୍ ମୋକ୍ଷନା
କାରଣରୂପ କାରଣସମଯସାରନେ ଜାଣତୋ ଥକୋ, ତ୍ରଣ ଗୁପ୍ତିଥୀ ଗୁପ୍ତ ଅଵସ୍ଥାମାଂ ଅନୁଭଵତୋ ଭେଦଜ୍ଞାନୀ
ପୁରୁଷ ବୀଜା ପ୍ରାଣୀ ପାସେଥୀ ଭଣତୋ ନଥୀ ଅନେ ବୀଜା ପ୍ରାଣୀନେ ପ୍ରେରତୋ ନଥୀ (ଅର୍ଥାତ୍ ଭଣାଵତୋ ନଥୀ),
କୋଈନୀ ସ୍ତୁତି କରତୋ ନଥୀ କେ କୋଈନୀ ନିଂଦା କରତୋ ନଥୀ. ୪୮.
गाथा – ४८
अन्वयार्थ : — [ज्ञानी ] निर्विकल्प ध्यानी पुरुष [कमपि न ] न किसीका [भणति ]
शिष्य होकर पढ़ता है, न गुरु होकर किसीको [भाणयति ] पढ़ाता है, [नैव स्तौति निंदति ]
न किसीकी स्तुति करता है, न किसीकी निंदा करता है, [सिद्धेः कारणं ] मोक्षका कारण [समं
भावं ] एक समभावको [परं ] निश्चयसे [जानन् ] जानता हुआ [तमेव ] केवल
आत्मस्वरूपमें अचल हो रहा है, अन्य कुछ भी शुभ-अशुभ कार्य नहीं करता ।
भावार्थ : — परमोपेक्षा संयम अर्थात् तीन गुप्तिमें स्थिर परम समाधि उसमें आरूढ जो
परमसंयम उसकी भावनारूप निर्मल यथार्थ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र वही जिसका
लक्षण है, ऐसा मोक्षका कारण जो समयसार उसे जानता हुआ, अनुभवता हुआ, अनुभवी पुरुष
न किसी प्राणीको सिखाता है, न किसीसे सीखता है, न स्तुति करता है, न निंदा करता है ।
जिसके शत्रु, मित्र, सुख, दुःख, सब एक समान हैं ।।४८।।