Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୩୦୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୫୦
विषयाणां उपरि परममुनिः द्वेषमपि करोति न रागम्
विषयेभ्यः येन विज्ञातः भिन्नः आत्मस्वभावः ।।५०।।
विसयहं इत्यादि विसयहं उप्परि विषयाणामुपरि परम-मुणि परममुनिः देसु वि करइ
ण राउ द्वेषमपि नापि करोति न च रागमपि येन किं कृतम् विसयहं जेण वियाणियउ
विषयेभ्यो येन विज्ञातः कोऽसौ विज्ञातः भिण्णउ अप्प-सहाउ आत्मस्वभावः कथंभूतो भिन्न
इति तथा च द्रव्येन्द्रियाणि भावेन्द्रियाणि द्रव्येन्द्रियभावेन्द्रियग्राह्यान् विषयांश्च द्रष्ट-
श्रुतानुभूतान् जगत्त्रये कालत्रयेऽपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यक्त्वा निजशुद्धात्म-
भावनासमुत्पन्नवीतरागपरमानन्दैकरूपसुखामृतरसास्वादेन तृप्तो भूत्वा यो विषयेभ्यो भिन्नं
शुद्धात्मानमनुभवति स मुनिपञ्चेन्द्रियविषयेषु रागद्वेषौ न करोति
अत्र यः
पञ्चेन्द्रियविषयसुखान्निवर्त्य स्वशुद्धात्मसुखे तृप्तो भवति तस्यैवेदं व्याख्यानं शोभते न च
ଭାଵାର୍ଥ:ଦ୍ରଵ୍ଯେନ୍ଦ୍ରିଯ ଅନେ ଭାଵେନ୍ଦ୍ରିଯନେ ଅନେ ଦ୍ରଵ୍ଯେନ୍ଦ୍ରିଯ ତଥା ଭାଵେନ୍ଦ୍ରିଯଥୀ ଗ୍ରାହ୍ଯ ଏଵା
ଦେଖେଲା, ସାଂଭଳେଲା, ଅନୁଭଵେଲା ଵିଷଯୋନେ ତ୍ରଣ ଲୋକ ଅନେ ତ୍ରଣ କାଳମାଂ ମନ-ଵଚନ-କାଯାଥୀ କୃତ,
କାରିତ, ଅନୁମୋଦନଥୀ ଛୋଡୀନେ ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ ଵୀତରାଗ ପରମାନଂଦ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ
ଛେ ଏଵା ସୁଖାମୃତନା ରସାସ୍ଵାଦଥୀ ତୃପ୍ତ ଥଈନେ ଜେ ଵିଷଯୋଥୀ ଭିନ୍ନ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାନେ ଅନୁଭଵେ ଛେ
ତେ ମୁନି ପାଂଚ ଇନ୍ଦ୍ରିଯୋନା ଵିଷଯମାଂ ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ କରତୋ ନଥୀ.
ଅହୀଂ, ଜେ ପାଂଚ ଇନ୍ଦ୍ରିଯନା ଵିଷଯସୁଖନେ ନିଵର୍ତୀନେ ସ୍ଵଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମସୁଖମାଂ ତୃପ୍ତ ରହେ ଛେ ତେନେ
गाथा५०
अन्वयार्थ :[परममुनिः ] महामुनि [विषयाणां उपरि ] पाँच इन्द्रियोंके स्पर्शादि
विषयों पर [रागमपि द्वेषं ] राग और द्वेष [न करोति ] नहीं करता, अर्थात् मनोज्ञ विषयों पर
राग नहीं करता और अनिष्ट विषयों पर द्वेष नहीं करता; क्योंकि [येन ] जिनसे [आत्मस्वभावः ]
अपना स्वभाव [विषयेभ्यः ] विषयोंसे [भिन्नः विज्ञातः ] जुदा समझ लिया है
इसलिये
वीतराग दशा धारण कर ली है
भावार्थ :द्रव्येन्द्री, भावेन्द्री और इन दोनोंसे ग्रहण करने योग्य देखे सुने
अनुभव किये जो रूपादि विषय हैं, उनको मन, वचन, काय, कृत, कारित अनुमोदनासे
छोड़कर और निज शुद्धात्माकी भावनासे उत्पन्न वीतराग परमानंदरूप अतींद्रियसुखके रसके
आस्वादनेसे तृप्त होकर विषयोंसे भिन्न अपने आत्माको जो मुनि अनुभवता है, वो ही
विषयोंमें राग-द्वेष नहीं करता
यहाँ पर तात्पर्य यह है, कि जो पंचेन्द्रियोंके विषयसुखसे
निवृत्त होकर निज शुद्ध आत्मसुखमें तृप्त होता है, उसीको यह व्याख्यान शोभा देता