Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-53 (Adhikar 2) Nishyathi Punya-Papani Aekata.

< Previous Page   Next Page >


Page 307 of 565
PDF/HTML Page 321 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
१८०) बंधहँ मोक्खहँ हेउ णिउ जो णवि जाणइ कोइ
सो पर मोहिं करइ जिय पुण्णु वि पाउ वि दोइ ।।५३।।
बन्धस्य मोक्षस्य हेतुः निजः यः नैव जानाति कश्चित्
स परं मोहेन करोति जीव पुण्यमपि पापमपि द्वे अपि ।।५३।।
बंधहं इत्यादि बंधहं बन्धस्य मोक्खहं मोक्षस्य हेउ हेतुः कारणम् कथंभूतम् णिउ
निजविभावस्वभावहेतुस्वरूपम् जो णवि जाणइ कोइ यो नैव जानाति कश्चित् सो पर
एव मोहिं मोहेन करइ करोति जिय हे जीव पुण्णु वि पाउ वि पुण्यमपि पापमपि
कतिसंख्योपेते अपि दो द्वे अपीति तथाहि निजशुद्धात्मानुभूतिरुचिविपरीतं मिथ्यादर्शनं
स्वशुद्धात्म-प्रतीतिविपरीतं मिथ्याज्ञानं निजशुद्धात्मद्रव्यनिश्चलस्थितिविपरीतं मिथ्याचारित्रमित्येतत्रयं
कारणं, तस्मात् त्रयाद्विपरीतं भेदाभेदरत्नत्रयस्वरूपम् मोक्षस्य कारणमिति योऽसौ न जानाति
ଜେ କୋଈ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଵିଭାଵପରିଣାମ ବଂଧନୋ ହେତୁ ଛେ ଅନେ ସ୍ଵଭାଵପରିଣାମ ମୋକ୍ଷନୋ
ହେତୁ ଛେ, ଏମ ଜାଣତୋ ନଥୀ, ତେ ଜ ପୁଣ୍ଯ ଅନେ ପାପ ବନ୍ନେନେ କରେ ଛେ ପଣ ବୀଜୋ ନହି. (ପଣ
ଜେ କୋଈ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ଵିଭାଵପରିଣାମ ବଂଧନୋ ହେତୁ ଛେ ଅନେ ସ୍ଵଭାଵପରିଣାମ ମୋକ୍ଷନୋ ହେତୁ ଛେ,
ଏମ ଜାଣେ ଛେ ତେ ପୁଣ୍ଯ, ପାପ ବନ୍ନେନେ କରତୋ ନଥୀ) ଏମ ମନମାଂ ରାଖୀନେ ଆ ସୂତ୍ର କହେ ଛେ :
ଭାଵାର୍ଥ:ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିରୂପ ରୁଚିଥୀ ଵିପରୀତ ମିଥ୍ଯାଦର୍ଶନ, ସ୍ଵ-ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ
ପ୍ରତୀତିଥୀ ଵିପରୀତ ମିଥ୍ଯାଜ୍ଞାନ ଅନେ ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯମାଂ ନିଶ୍ଚଲ ସ୍ଥିତିଥୀ ଵିପରୀତ ମିଥ୍ଯାଚାରିତ୍ର
ଏ ତ୍ରଣ ବଂଧନୁଂ କାରଣ ଛେ ଅନେ ତ୍ରଣେଯଥୀ ଵିପରୀତ ଏଵୁଂ ଭେଦାଭେଦ ରତ୍ନତ୍ରଯସ୍ଵରୂପ ମୋକ୍ଷନୁଂ କାରଣ
ଛେ, ଏମ ଜେ କୋଈ ଜାଣତୋ ନଥୀ ତେ ଜଜୋ କେ ପୁଣ୍ଯ ଅନେ ପାପ ବନ୍ନେଯ ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ହେଯ ଛେ
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୫୩ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୩୦୭
गाथा५३
अन्वयार्थ :[यः कश्चित् ] जो कोई जीव [बंधस्य मोक्षस्य हेतुः ] बंध और
मोक्षका कारण [निजः ] अपना विभाव और स्वभाव परिणाम है, ऐसा भेद [नैव जानाति ]
नहीं जानता है, [स एव ] वही [पुण्यमपि पापमपि ] पुण्य और पाप [द्वे अपि ] दोनोंको ही
[मोहेन ] मोहसे [करोति ] करता है
भावार्थ :निज शुद्धात्माकी अनुभूतिकी रुचिसे विपरीत जो मिथ्यादर्शन, निज
शुद्धात्माके ज्ञानसे विपरीत मिथ्याज्ञान, और निज शुद्धात्मद्रव्यमें निश्चल स्थिरतासे उल्टा जो
मिथ्याचारित्र इन तीनोंको बंधका कारण और इन तीनोंसे रहित भेदाभेद रत्नत्रयस्वरूप मोक्षका