Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
पुण्यपापरहितशुद्धात्मनः सकाशाद्विलक्षणे सुवर्णलोहनिगलवद्बन्धं प्रति समाने एव भवतः एवं
नयविभागेन योऽसौ पुण्यपापद्वयं समानं न मन्यते स निर्मोहशुद्धात्मनो विपरीतेन मोहेन मोहितः
सन् संसारे परिभ्रमति इति
अत्राह प्रभाकरभट्टः तर्हि ये केचन पुण्यपापद्वयं समानं कृत्वा
तिष्ठन्ति तेषां किमिति दूषणं दीयते भवद्भिरिति भगवानाह यदि शुद्धात्मानुभूतिलक्षणं
त्रिगुप्तिगुप्तवीतरागनिर्विकल्पपरमसमाधिं लब्ध्वा तिष्ठन्ति तदा संमतमेव यदि पुनस्तथाविधाम-
वस्थामलभमाना अपि सन्तो गृहस्थावस्थायां दानपूजादिकं त्यजन्ति तपोधनावस्थायां
षडावश्यकादिकं च त्यक्त्वोभयभ्रष्टाः सन्तः तिष्ठन्ति तदा दूषणमेवेति तात्पर्यम्
।।५५।।
अथ येन पापफ लेन जीवो दुःखं प्राप्य दुःखविनाशार्थं धर्माभिमुखो भवति तत्पापमपि
समीचीनमिति दर्शयति
ଏଵୁଂ କଥନ ସାଂଭଳୀନେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ ପୂଛେ ଛେ କେ ଜୋ ଏମ ଛେ ତୋ ଜେ କୋଈ (ପରମତଵାଦୀ)
ପୁଣ୍ଯ-ପାପ ବନ୍ନେନେ ସରଖା ମାନୀନେ ଵର୍ତେ ଛେ ତେମନେ ଆପ ଶା ମାଟେ ଦୂଷଣ ଆପୋ ଛୋ? ଭଗଵାନ
ଯୋଗୀନ୍ଦ୍ରଦେଵ କହେ ଛେ କେ ଜୋ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିସ୍ଵରୂପ ତ୍ରଣ ଗୁପ୍ତିଥୀ ଗୁପ୍ତ ଏଵୀ ଵୀତରାଗ
ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ପରମ ସମାଧିନେ ପାମୀନେ ସ୍ଥିତ ଥାଯ ଛେ ତ୍ଯାରେ ତୋ ସଂମତ ଜ ଛେ (ତ୍ଯାରେ ତୋ ପୁଣ୍ଯ
-ପାପନେ ସମାନ ମାନଵା ତେ ତୋ ଯଥାର୍ଥ ଜ ଛେ) ପଣ ଜୋ ତେଵୀ ଅଵସ୍ଥାନେ ପ୍ରାପ୍ତ କର୍ଯା ସିଵାଯ
ଜେ ଗୃହସ୍ଥଅଵସ୍ଥାମାଂ ଦାନ-ପୂଜାଦିକ ଛୋଡେ ଛେ ଅନେ ମୁନିନୀ ଅଵସ୍ଥାମାଂ ଛ ଆଵଶ୍ଯକ ଆଦିନେ
ଛୋଡୀନେ ଉଭଯଭ୍ରଷ୍ଟ (ବନ୍ନେ ବାଜୁଥୀ ଭ୍ରଷ୍ଟ) ଥତୋ ଵର୍ତେ ଛେ ତ୍ଯାରେ ତୋ ଦୂଷଣ ଜ ଛେ, (ତ୍ଯାରେ ତୋ
ପୁଣ୍ଯ-ପାପ ବନ୍ନେନେ ସମାନ ମାନଵାଂ ତେ ତୋ ଦୂଷଣ ଜ ଛେ) ଏଵୁଂ ତାତ୍ପର୍ଯ ଛେ. ୫୫.
ହଵେ, ଜେ ପାପନା ଫଳଥୀ ଜୀଵ ଦୁଃଖ ପାମୀନେ ଦୁଃଖନେ ଦୂର କରଵା ମାଟେ ଧର୍ମନୀ ସନ୍ମୁଖ ଥାଯ
ଛେ ତେ ପାପ ପଣ ସମୀଚୀନ (ସାରୁଂ) ଛେ, ଏମ ଦର୍ଶାଵେ ଛେ :
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୫୫ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୩୧୧
प्रभाकरभट्ट बोले, यदि ऐसा ही है, तो कितने ही परमतवादी पुण्य-पापको समान मानकर
स्वच्छंद हुए रहते हैं, उनको तुम दोष क्यों देते हो ? तब योगीन्द्रदेवने कहा
जब
शुद्धात्मानुभूतिस्वरूप तीन गुप्तिसे गुप्त वीतरागनिर्विकल्पसमाधिको पाकर ध्यानमें मग्न हुए पुण्य
-पापको समान जानते हैं, तब तो जानना योग्य है
परन्तु जो मूढ़ परमसमाधिको न पाकर
भी गृहस्थ - अवस्थामें दान, पूजा आदि शुभ क्रियाओंको छोड़ देते हैं, और मुनि पदमें छह
आवश्यककर्मोंको छोड़ते हैं, वे दोनों बातोंसे भ्रष्ट हैं न तो यती हैं, न श्रावक हैं वे निंदा
योग्य ही हैं तब उनको दोष ही है, ऐसा जानना ।।५५।।
आगे जिस पापके फ लसे यह जीव नरकादिमें दुःख पाकर उस दुःखके दूर करनेके
लिये धर्मके सम्मुख होता है, वह पापका फ ल भी श्रेष्ठ (प्रशंसा योग्य) है, ऐसा दिखलाते
हैं