Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-60 (Adhikar 2).

< Previous Page   Next Page >


Page 318 of 565
PDF/HTML Page 332 of 579

background image
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
धर्मपुत्रभीमार्जुनादिवदक्षयसुखं लभन्ते, ये केचन पुनर्नकुलसहदेवादिवत् स्वर्गसुखं लभन्ते ये
तु सम्यक्त्वरहितास्ते पुण्यं कुर्वाणा अपि दुःखमनन्तमनुभवन्तीति तात्पर्यम् ।।५९।।
अथ निश्चयेन पुण्यं निराकरोति
१८७) पुण्णेण होइ विहवो विहवेण मओ मएण मइ-मोहो
मइ-मोहेण य पावं ता पुण्णं अम्ह मा होउ ।।६०।।
पुण्येन भवति विभवो विभवेन मदो मदेन मतिमोहः
मतिमोहेन च पापं तस्मात् पुण्यं अस्माकं मा भवतु ।।६०।।
पुण्णेण इत्यादि पुण्णेण होइ विहवो पुण्येन विभवो विभूतिर्भवति, विहवेण मआ
विभवेन मदोऽहंकारो गर्वो भवति, मएण मइ-मोहाे विज्ञानाद्यष्टविधमदेन मतिमोहो मतिभ्रंशो
ତେମାଂନା କେଟଲାକ ତୋ ଆ ଭଵମାଂ ଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନାଦିନୀ ମାଫକ ଅକ୍ଷଯ ସୁଖ ପାମେ ଛେ
ଅନେ କେଟଲାକ ନକୁଲ, ସହଦେଵାଦିନୀ ମାଫକ ସ୍ଵର୍ଗସୁଖ ପାମେ ଛେ, ପଣ ଜେଓ ସମ୍ଯକ୍ତ୍ଵ ରହିତ ଛେ ତେଓ
ପୁଣ୍ଯ କରଵା ଛତାଂ ପଣ ଅନଂତ ଦୁଃଖ ଜ ଅନୁଭଵେ ଛେ. ୫୯.
ହଵେ, ନିଶ୍ଚଯନଯଥୀ ପୁଣ୍ଯନେ ନିଷେଧେ ଛେ.
ଭାଵାର୍ଥ :ଭେଦାଭେଦରତ୍ନତ୍ରଯନୀ ଆରାଧନା ରହିତ, ଦେଖେଲା, ସାଂଭଳେଲା ଅନେ ଅନୁଭଵେଲା
ଭୋଗୋନୀ ଆକାଂକ୍ଷାରୂପ ନିଦାନବଂଧନା ପରିଣାମ ସହିତ ଜେ ଜୀଵ ଛେ ତେ ଜୀଵଥୀ ପୂର୍ଵଭଵମାଂ ଜେ ଆ
୩୧୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୬୦
वे इसी भवमें युधिष्ठिर, भीम, अर्जुनकी तरह अविनाशी सुखको पाते हैं, और कितने ही नकुल,
सहदेवकी तरह अहमिंद्र
पदके सुख पाते हैं तथा जो सम्यक्त्वसे रहित मिथ्यादृष्टिजीव पुण्य
भी करते हैं, तो भी मोक्षके अधिकारी नहीं हैं, संसारीजीव ही हैं, यह तात्पर्य जानना ।।५९।।
आगे निश्चयसे मिथ्यादृष्टियोंके पुण्यका निषेध करते हैं
गाथा६०
अन्वयार्थ :[पुण्येन ] पुण्यसे घरमें [विभवः ] धन [भवति ] होता है, और
[विभवेन ] धनसे [मदः ] अभिमान, [मदेन ] मानसे [मतिमोहः ] बुद्धिभ्रम होता है,
[मतिमोहेन ] बुद्धिके भ्रम होनेसे (अविवेकसे) [पापं ] पाप होता है, [तस्मात् ] इसलिये
[पुण्यं ] ऐसा पुण्य [अस्माकं ] हमारे [मा भवतु ] न होवे
भावार्थ :भेदाभेदरत्नत्रयकी आराधनासे रहित, देखे, सुने, अनुभव किये भोगोंकी
वाँछारूप निदानबंधके परिणामों सहित जो मिथ्यादृष्टि संसारी अज्ञानी जीव हैं, उसने पहले