Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
जीवः पुण्णें अमरु वियाणु पुण्येनामरो देवो भवतीति जानीहि । मिस्सें माणुस-गइ लहइ मिश्रेण
पुण्यपापद्वयेन मनुष्यगतिं लभते । दोहि वि खइ णिव्वाणु द्वयोरपि कर्मक्षयेऽपि निर्वाणमिति ।
तद्यथा । सहजशुद्धज्ञानानन्दैकस्वभावात्परमात्मनः सकाशाद्विपरीतेन छेदनादिनारकतिर्यग्गति-
दुःखदानसमर्थेन पापकर्मोदयेन नारकतिर्यग्गतिभाजनो भवति जीवः । तस्मादेव शुद्धात्मनो
विलक्षणेन पुण्योदयेन देवो भवति । तस्मादेव शुद्धात्मनो विपरीतेन पुण्यपापद्वयेन मनुष्यो भवति ।
तस्यैव विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावेन निजशुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपेण शुद्धोपयोगेन
मुक्त ो भवतीति तात्पर्यार्थः । तथा चोक्त म् — ‘‘पावेण णरयतिरियं गम्मइ धम्मेण देवलोयम्मि ।
मिस्सेण माणुसत्तं दोण्हं पि खएण णिव्वाणं ।।’’ ।।६३।।
अथ निश्चयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनस्वरूपे स्थित्वा व्यवहारप्रतिक्रमण प्रत्याख्याना-
୩୨୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୬୩
उसके उदयसे नरक तिर्यंचगतिका पात्र होता है, आत्मस्वरूपसे विपरीत शुभ कर्मोंके उदयसे
देव होता है, दोनोंके मेलसे मनुष्य होता है, और शुद्धात्मस्वरूपसे विपरीत इन दोनों पुण्य
-पापोंके क्षयसे निर्वाण (मोक्ष) मिलता है । मोक्षका कारण एक शुद्धोपयोग है, वह शुद्धोपयोग
निज शुद्धात्मतत्त्वके सम्यक् श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप है । इसलिये इस शुद्धोपयोगके बिना
किसी तरह भी मुक्ति नहीं हो सकती, यह सारांश जानो । ऐसा ही सिद्धान्त – ग्रन्थमें भी हरएक
जगह कहा गया है । जैसे — यह जीव पापसे नरक तिर्यंचगतिको जाता है, और धर्म (पुण्य)
से देवलोकमें जाता है, पुण्य-पाप दोनोंके मेलसे मनुष्यदेहको पाता है, और दोनोंके क्षयसे मोक्ष
पाता है ।।६३।।
आगे निश्चयप्रतिक्रमण, निश्चयप्रत्याख्यान और निश्चयआलोचनारूप जो शुद्धोपयोग
ନରକଗତି ଅନେ ତିର୍ଯଂଚଗତିନାଂ ଛେଦନ ଆଦି ଦୁଃଖ ଦେଵାମାଂ ସମର୍ଥ ଏଵା ପାପକର୍ମନା ଉଦଯଥୀ ଜୀଵ
ନାରକଗତିନୁଂ ଅନେ ତିର୍ଯଂଚଗତିନୁଂ ଭାଜନ ଥାଯ ଛେ, ତେ ଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଏଵା ପୁଣ୍ଯୋଦଯଥୀ
ଦେଵ ଥାଯ ଛେ, ତେ ଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମାଥୀ ଵିପରୀତ ପୁଣ୍ଯ-ପାପ ଦ୍ଵଯଥୀ ମନୁଷ୍ଯ ଥାଯ ଛେ ଅନେ ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନ,
ଵିଶୁଦ୍ଧଦର୍ଶନ ଜେନୋ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା ତେ ଜ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନାଂ ସମ୍ଯକ୍ଶ୍ରଦ୍ଧାନ, ସମ୍ଯଗ୍ଜ୍ଞାନ ଅନେ
ସମ୍ଯଗ୍ ଅନୁଷ୍ଠାନରୂପ ଶୁଦ୍ଧୋପଯୋଗଥୀ ମୁକ୍ତ ଥାଯ ଛେ. ଵଳୀ କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ — ‘‘पावेण णरयतिरियं
गम्मइ धम्मेण देवलोयम्मि । मिस्सेण माणुसत्तं दोण्हं पि खएण णिव्वाणं ।।’’ (ଅର୍ଥ: — ଆ ଜୀଵ ପାପଥୀ
ନରକଗତି ଅନେ ତିର୍ଯଂଚଗତିମାଂ ଜାଯ ଛେ. ଧର୍ମଥୀ ଅର୍ଥାତ୍ ପୁଣ୍ଯଥୀ ଦେଵଲୋକମାଂ ଜାଯ ଛେ, ପୁଣ୍ଯ ପାପ
ବନ୍ନେନା ମିଶ୍ରଣଥୀ ମନୁଷ୍ଯପଣୁଂ ପାମେ ଛେ ଅନେ ବନ୍ନେନା କ୍ଷଯଥୀ ନିର୍ଵାଣ ପାମେ ଛେ. ୬୩.
ହଵେ, ଜ୍ଞାନୀ ନିଶ୍ଚଯ ପ୍ରତିକ୍ରମଣ, ନିଶ୍ଚଯପ୍ରତ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଅନେ ନିଶ୍ଚଯ ଆଲୋଚନାସ୍ଵରୂପମାଂ ସ୍ଥିତ