Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
शुद्धनिर्विकल्पपरमात्मतत्त्वभावनाबलेन द्रष्टश्रुतानुभूतभोगाकांक्षास्मरणरूपाणामतीतरागादिदोषाणां
निराकरणं निश्चयप्रतिक्रमणं भवति, वीतरागचिदानन्दैकानुभूतिभावनाबलेन भाविभोगाकांक्षा-
रूपाणां रागादिनां त्यजनं निश्चयप्रत्याख्यानं भण्यते, निजशुद्धात्मोपलम्भबलेन वर्तमानोदयागत-
शुभाशुभनिमित्तानां हर्षविषादादिपरिणामानां निजशुद्धात्मद्रव्यात् पृथक्करणं निश्चयालोचनमिति ।
इत्थंभूते निश्चयप्रतिक्रमणप्रत्याख्यानालोचनत्रये स्थित्वा योऽसौ व्यवहारप्रतिक्रमणप्रत्याख्याना-
लोचनत्रयं तन्त्रयानुकूलं वन्दननिन्दनादिशुभोपयोगं च त्यजन् स ज्ञानी भण्यते न चान्य इति
भावार्थः ।।६४।।
अथ —
୩୨୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୬୪
अनुभूतिकी भावनाके बलसे होनेवाले भोगोंकी वाँछारूप रागादिकका त्याग वह
निश्चयप्रत्याख्यान, और निज शुद्धात्माकी प्राप्तिके बलसे वर्तमान उदयमें आये जो शुभ-अशुभके
कारण हर्ष-विषादादि अशुद्ध परिणाम उनको निज शुद्धात्मद्रव्यसे जुदा करना वह
निश्चयआलोचन; इस तरह निश्चयप्रतिक्रमण प्रत्याख्यान और आलोचनामें ठहरकर जो कोई
व्यवहारप्रतिक्रमण, व्यवहारप्रत्याख्यान, व्यवहारआलोचना, इन तीनोंके अनुकूल वन्दना, निंदा
आदि शुभोपयोग है, उनको छोड़ता है वही ज्ञानी कहा जाता है, अन्य नहीं । सारांश यह है
कि ज्ञानी जीव पहले तो अशुभको त्यागकर शुभमें प्रवृत्त होता है, बाद शुभको भी छोड़के
शुद्धमें लग जाता है । पहले किये हुए अशुभ कर्मोंकी निवृत्ति वह व्यवहारप्रतिक्रमण,
अशुभपरिणाम होनेवाले हैं, उनका रोकना वह व्यवहारप्रत्याख्यान, और वर्तमानकालमें शुभकी
प्रवृत्ति अशुभकी निवृत्ति वह व्यवहारआलोचन है । व्यवहारमें तो अशुभका त्याग शुभका
अंगीकार होता है, और निश्चयमें शुभ-अशुभ दोनोंका ही त्याग होता है ।।६४।।
आगे इसी कथनको दृढ़ करते हैं —
ଭଵିଷ୍ଯକାଳନା ଭୋଗୋନୀ ଆକାଂକ୍ଷାରୂପ ରାଗାଦିନୋ ତ୍ଯାଗ କରଵୋ ତେ ନିଶ୍ଚଯପ୍ରତ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଛେ ଅନେ
ନିଜଶୁଦ୍ଧାତ୍ମାନୀ ପ୍ରାପ୍ତିନା ବଳଥୀ ଵର୍ତମାନ ଉଦଯମାଂ ଆଵେଲାଂ ଶୁଭାଶୁଭ କର୍ମୋ ଜେମନା ନିମିତ୍ତ ହୋଯ
ଛେ, ଏଵା ହର୍ଷଵିଷାଦ ଆଦି ପରିଣାମୋନେ ନିଜଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଜୁଦା କରଵା ତେ ନିଶ୍ଚଯ ଆଲୋଚନା
ଛେ.
ଆଵା ନିଶ୍ଚଯପ୍ରତିକ୍ରମଣ, ନିଶ୍ଚଯପ୍ରତ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଅନେ ନିଶ୍ଚଯଆଲୋଚନା ଏ ତ୍ରଣେମାଂ ସ୍ଥିର ଥଈନେ
ଜେ ଵ୍ଯଵହାରପ୍ରତିକ୍ରମଣ, ଵ୍ଯଵହାରପ୍ରତ୍ଯାଖ୍ଯାନ ଅନେ ଵ୍ଯଵହାର ଆଲୋଚନା ଏ ତ୍ରଣେଯ ତଥା ଏ ତ୍ରଣନେ
ଅନୁକୂଳ ଏଵା ଵଂଦନା, ନିଂଦା ଆଦି ଶୁଭୋପଯୋଗନେ ଛୋଡେ ଛେ ତେ ଜ୍ଞାନୀ ଛେ, ପଣ ବୀଜୋ କୋଈ ଜ୍ଞାନୀ
ନଥୀ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୬୪.
ହଵେ, ଆ କଥନନେ ଦ୍ରଢ କରେ ଛେ : —