Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୬୯ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୩୩୫
परिणाम ही कर्तव्य है, वही धर्म है ।।६८।।
आगे शुद्ध भाव ही मोक्षका मार्ग है, ऐसा दिखलाते हैं —
गाथा – ६९
अन्वयार्थ : — [सिद्धेः संबंधी ] मुक्तिका [पंथाः ] मार्ग [एकः विशुद्धः भावः ] एक
शुद्ध भाव ही है । [यः मुनिः ] जो मुनि [तस्मात् भावात् ] उस शुद्ध भावसे [चलति ]
चलायमान हो जावे, तो [सः ] वह [कथं ] कैसे [विमुक्तः ] मुक्त [भवति ] हो सकता है ?
किसी प्रकार नहीं हो सकता ।
भावार्थ : — जो समस्त शुभाशुभ संकल्प-विकल्पोंसे रहित जीवका शुद्ध भाव है, वही
निश्चयरत्नत्रयस्वरूप मोक्षका मार्ग है । जो मुनि शुद्धात्म परिणामसे च्युत हो जावे, वह किस
तरह मोक्षको पा सकता है ? नहीं पा सकता । मोक्षका मार्ग एक शुद्ध भाव ही है, इसलिये
अथ विशुद्धभाव एव मोक्षमार्ग इति दर्शयति —
१९६) सिद्धिहिँ केरा पंथडा भाउ विसुद्धउ एक्कु ।
जो तसु भावहँ मुणि चलइ सो किम होइ विमुक्कु ।।६९।।
सिद्वेः संबन्धो पन्थाः भावो विशुद्ध एकः ।
यः तस्माद्भावात् मुनिश्चलति स कथं भवति विमुक्त : ।।६९।।
सिद्धिहिं इत्यादि । सिद्धिहिं केरा सिद्धेर्मुक्त ेः संबन्धी पंथडा पन्था मार्गः । कोऽसौ ।
भाउ भावः परिणामः कथंभूतः । विसुद्धउ विशुद्धः एक्कु एक एवाद्वितीयः । जो तसु भावहं
मुणि चलइ यस्तस्माद्भावान्मुनिश्चलति । सो किम् होइ विमुक्कु स मुनिः कथं मुक्त ो भवति
न कथमपीति । तद्यथा । योऽसौ समस्तशुभाशुभसंकल्पविकल्परहितो जीवस्य शुद्धभावः स एव
निश्चयरत्नत्रयात्मको मोक्षमार्गः । यस्तस्मात् शुद्धात्मपरिणामान्मुनिश्च्युतो भवति स कथं मोक्षं
ଜ ଛେ) ତେଥୀ ସର୍ଵ ପ୍ରକାରେ ଶୁଦ୍ଧ ପରିଣାମ ଜ କର୍ତଵ୍ଯ ଛେ. ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୬୮.
ହଵେ, ଵିଶୁଦ୍ଧ ଭାଵ ଜ ମୋକ୍ଷମାର୍ଗ ଛେ, ଏମ ଦର୍ଶାଵେ ଛେ : —
ଭାଵାର୍ଥ: — ଜୀଵନୋ ଜେ ସମସ୍ତ ଶୁଭାଶୁଭ ସଂକଲ୍ପଵିକଲ୍ପରହିତ ଶୁଦ୍ଧଭାଵ ଛେ ତେ ଜ
ନିଶ୍ଚଯରତ୍ନତ୍ରଯାତ୍ମକ ମୋକ୍ଷମାର୍ଗ ଛେ. ତେଥୀ ଶୁଦ୍ଧଆତ୍ମପରିଣାମଥୀ ଜେ ମୁନି ଚ୍ଯୁତ ଥାଯ ଛେ ତେ କେଵୀ ରୀତେ
ମୋକ୍ଷ ପାମେ? ଅର୍ଥାତ୍ ନ ଜ ପାମେ.