Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୩୭୦ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୯୧
मिथ्यात्वरागादिरूपः सचित्तः, द्रव्यकर्मनोकर्मरूपः पुनरचित्तः, द्रव्यकर्मभावकर्मरूपस्तु मिश्रः ।
वीतरागत्रिगुप्तसमाधिस्थपुरुषापेक्षया सिद्धरूपः सचित्तः पुद्गलादिपञ्चद्रव्यरूपः पुनरचित्तः,
गुणस्थानमार्गणास्थानजीवस्थानादिपरिणतः संसारी जीवस्तु मिश्रश्चेति । एवंविधबाह्याभ्यन्तर-
परिग्रहरहितं जिनलिङ्गं गृहीत्वापि ये शुद्धात्मानुभूतिविलक्षणमिष्टपरिग्रहं गृह्णन्ति ते
छर्दिताहारग्राहकपुरुषसद्रशा भवन्तीति भावार्थः । तथा चोक्त म् — ‘‘त्यक्त्वा स्वकीयपितृ-
मित्रकलत्रपुत्रान् सक्त ोऽन्य गेहवनितादिषु निर्मुमुक्षुः । दोर्भ्यां पयोनिधिसमुद्गतनक्रचक्रं प्रोत्तीर्य
गोष्पदजलेषु निमग्नवान् सः ।।’’ ।।९१।।
ଅଚିତ୍ତ ପରିଗ୍ରହ ଛେ ଅନେ ଦ୍ରଵ୍ଯକର୍ମ, ଭାଵକର୍ମରୂପ ମିଶ୍ର ପରିଗ୍ରହ ଛେ. ଵୀତରାଗ ତ୍ରଣ ଗୁପ୍ତିଥୀ ଗୁପ୍ତ
ସମାଧିସ୍ଥ ପୁରୁଷନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ସିଦ୍ଧରୂପ ସଚିତ୍ତ ପରିଗ୍ରହ ଛେ ଅନେ ପୁଦ୍ଗଲାଦି ପାଂଚ ଦ୍ରଵ୍ଯରୂପ ଅଚିତ୍ତ
ପରିଗ୍ରହ ଛେ ଅନେ ଗୁଣସ୍ଥାନ, ମାର୍ଗଣାସ୍ଥାନ, ଜୀଵସ୍ଥାନ ଆଦି ରୂପେ ପରିଣତ ସଂସାରୀ ଜୀଵ ମିଶ୍ର
ପରିଗ୍ରହ ଛେ. ଆ ପ୍ରକାରନା ବାହ୍ଯ ଅଭ୍ଯଂତର ପରିଗ୍ରହ ରହିତ ଜିନଲିଂଗନେ ଗ୍ରହୀନେ ପଣ ଜେଓ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମାନୀ ଅନୁଭୂତିଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଇଷ୍ଟ ପରିଗ୍ରହନୁଂ ଗ୍ରହଣ କରେ ଛେ, ତେଓ ଵମନ କରେଲା ଆହାରନେ ଗ୍ରହଣ
କରନାର ପୁରୁଷ ଜେଵା ଛେ.
କହ୍ଯୁଂ ପଣ ଛେ କେ – ‘‘त्यक्त्वा स्वकीयपितृमित्रकलत्रपुत्रान् सक्त ोऽन्य गेहवनितादिषु निर्मुमुक्षुः । दोर्भ्यों
पयोनिधिसमुद्गतनक्रचक्रं प्रोत्तीर्य गोष्पदजलेषु निमग्नवान् सः ।।’’
(ଅର୍ଥ: — ଜେ ନିର୍ମୁମୁକ୍ଷୁ ପୋତାନାଂ ପିତା, ମିତ୍ର, ପତ୍ନୀ ଅନେ ପୁତ୍ରୋନେ ଛୋଡୀନେ ଅନ୍ଯ ଘରନାଂ
कमंडलु, पुस्तकादि सहित शिष्यादि अथवा साधुके भावोंकी अपेक्षा सचित्त परिग्रह मिथ्यात्व
रागादि, अचित परिग्रह द्रव्यकर्म, नोकर्म और मिश्र परिग्रह द्रव्यकर्म, भावकर्म दोनों मिले हुए ।
अथवा वीतराग त्रिगुप्तिमें लीन ध्यानी पुरुषकी अपेक्षा सचित्त परिग्रह सिद्धपरमेष्ठीका ध्यान,
अचित्त परिग्रह पुद्गलादि पाँच द्रव्यका विचार, और मिश्र परिग्रह गुणस्थान मार्गणास्थान
जीवसमासादिरूप संसारीजीवका विचार । इस तरह बाहिरके और अंतरके परिग्रहसे रहित जो
जिनलिंग उसे ग्रहण कर जो अज्ञानी शुद्धात्माकी अनुभूतिसे विपरीत परिग्रहको ग्रहण करते हैं,
वे वमन करके पीछे आहार करनेवालोंके समान निंदाके योग्य होते हैं । ऐसा दूसरी जगह भी
कहा है, कि जो जीव अपने माता, पिता, पुत्र, मित्र, कलत्र इनको छोड़कर परके घर और
पुत्रादिकमें मोह करते हैं, अर्थात् अपना परिवार छोड़कर शिष्य – शाखाओंमें राग करते हैं, वे
भुजाओंसे समुद्रको तैरके गायके खुरसे बने हुए गढ़ेके जलमें डूबते हैं, कैसा है समुद्र, जिसमें
जलचरोंके समूह प्रगट हैं, ऐसे अथाह समुद्रको तो बाहोंसे तिर जाता है, लेकिन गायके खुरके
जलमें डूबता है । यह बड़ा अचंभा है । घरका ही संबंध छोड़ दिया तो पराये पुत्रोंसे क्या राग
करना ? नहीं करना ।।९१।।