Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-114 (Adhikar 2) Snehano Tyag.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୧୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୪୦୯
ଭାଵାର୍ଥ:ହେ ପ୍ରଭାକରଭଟ୍ଟ! ଲୋଭକଷାଯଥୀ ଵିପରୀତ ଏଵା ପରମାତ୍ମସ୍ଵଭାଵଥୀ ଵିପରୀତ
ଲୋଭନେ ତୁଂ ଛୋଡ, କାରଣ କେ ନିର୍ଲୋଭ ଏଵା ପରମାତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ରହିତ ଜୀଵୋ ଦୁଃଖ ଭୋଗଵୀ ରହ୍ଯାଂ
ଛେ. ୧୧୩.
ହଵେ, ଆ ଜ ଲୋଭକଷାଯନା ଦୋଷ ଦ୍ରଷ୍ଟାଂତଥୀ ସିଦ୍ଧ କରେ ଛେ :
हे योगिन् लोभं परित्यज कस्मात् लोभो भद्रः समीचीनो न भवति लोभासक्तं
समस्तं जगद् दुःखं सहमानं पश्येति तथाहिलोभकषायविपरीतात् परमात्मस्वभावाद्विपरीतं
लोभं त्यज हे प्रभाकरभट्ट यतः कारणात् निर्लोभपरमात्मभावनारहिताजीवा दुःखमुप-
भुञ्जानास्तिष्ठन्तीति तात्पर्यम् ।।११।।
अथामुमेव लोभकषायदोषं द्रष्टान्तेन समर्थयति
२४४) तलि अहिरणि वरि घण-वडणु संडस्सय-लुंचोडु
लोहहँ लग्गिवि हुयवहहँ पिक्खु पडंतउ तोडु ।।११४।।
तले अधिकरणं उपरि घनपातनं संदशकलुञ्चनम्
लोहं लगित्वा हुतवहस्य पश्य पतत् त्रोटनम् ।।११४।।
तले अधस्तनभागेऽधिकरणसंज्ञोपकरणं उपरितनभागे घनघातपातनं तथैव संडसक-
यह लोभ [भद्रः न भवति ] अच्छा नहीं है, क्योंकि [लोभासक्तं ] लोभमें फ ँसे हुए [सकलं
जगत् ] सम्पूर्ण जगत्को [दुःखं सहमानं ] दुःख सहते हुए [पश्य ] देख
भावार्थ :लोभकषायसे रहित जो परमात्मस्वभाव उससे विपरीत जो इसभव
परभवका लोभ, धन धान्यादिका लोभ उसे तू छोड़ क्योंकि लोभी जीव भव भवमें दुःख
भोगते हैं, ऐसा तू देख रहा है ।।११३।।
आगे लोभकषायके दोषको दृष्टांतसे पुष्ट करते हैं
गाथा११४
अन्वयार्थ :[लोहं लगित्वा ] जैसे लोहेका संबंध पाकर [हुतवहं ] अग्नि [तले ]
नीचे रक्खे हुए [अधिकरणं उपरि ] अहरन (निहाई) के ऊ पर [घनपातनं ] घनकी चोट,
[संदशकुलुंचनम् ] संडासीसे खेंचना, [पतत् त्रोटनम् ] चोट लगनेसे टूटना, इत्यादि दुःखोंको
सहती हैं, ऐसा [पश्य ] देख
भावार्थ :लोहेकी संगतिसे लोकप्रसिद्ध देवता अग्नि दुःख भोगती हैं, यदि लोहेका