ଅଥଵା ଧର୍ମ ପ୍ରଭାଵନା ଅର୍ଥେ ପ୍ରତିମାସ୍ଥାପନାରୂପ ଦେଵ ଅଥଵା ପ୍ରତିମାରୂପ ରାଗାଦିରୂପେ ପରିଣତ
ମିଥ୍ଯାଦେଵ, ଵୀତରାଗ ନିର୍ଵିକଲ୍ପ ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵଥୀ ମାଂଡୀନେ ସମସ୍ତ ପଦାର୍ଥନୁଂ ପ୍ରତିପାଦକ ଶାସ୍ତ୍ର ଅନେ
ମିଥ୍ଯା ଶାସ୍ତ୍ର, ଲୋକାଲୋକନା ପ୍ରକାଶକ କେଵଳଜ୍ଞାନ ଆଦି ଗୁଣୋଥୀ ସମୃଦ୍ଧ ଏଵା ପରମାତ୍ମାନୋ ପ୍ରଚ୍ଛାଦକ
ଜେ ମିଥ୍ଯାତ୍ଵ, ରାଗାଦିରୂପେ ପରିଣତିରୂପ ଜେ ଅଜ୍ଞାନରୂପୀ ଅଂଧକାରନୋ ଦର୍ପ ଜେନା ଵଚନରୂପୀ ସୂର୍ଯନା
କିରଣୋଥୀ ଵିଦାରିତ ଥଯୋ ଥକୋ କ୍ଷଣମାତ୍ରମାଂ ନାଶ ପାମେ ଛେ ଏଵା ଜିନଦୀକ୍ଷା ଦେନାର ଶ୍ରୀଗୁରୁ ଅଥଵା
ତେନାଥୀ ଵିପରୀତ ମିଥ୍ଯାଗୁରୁ, ସଂସାରସମୁଦ୍ରନା ତରଵାନା ଉପାଯଭୂତ ନିଜ ଶୁଦ୍ଧ ଆତ୍ମତତ୍ତ୍ଵନୀ
ଭାଵନାରୂପ ନିଶ୍ଚଯତୀର୍ଥ, ତେନା ସ୍ଵରୂପମାଂ ରତ ତପୋଧନନା ଆଵାସଭୂତ ତୀର୍ଥକ୍ଷେତ୍ରୋ ପଣ ଅଥଵା
गुणस्मरणार्थं धर्मप्रभावनार्थं वा प्रतिमास्थापनारूपो देवो रागादिपरिणतदेवताप्रतिमारूपो वा, सत्थु
वीतरागनिर्विकल्पात्मतत्त्वप्रभृतिपदार्थप्रतिपादकं शास्त्रं मिथ्याशास्त्रं वा, गुरु लोकालोकप्रकाशक-
केवलज्ञानादिगुणसमृद्धस्य परमात्मनः प्रच्छादको मिथ्यात्वरागादिपरिणतिरूपो महाऽज्ञानान्ध-
कारदर्पः तद्व्यापियद्वचनदिनकरकिरणविदारितः सन् क्षणमात्रेण च विलयं गतः स
जिनदीक्षादायकः श्रीगुरुः तद्विपरीतो मिथ्यागुरुर्वा, तित्थु वि संसारतरणोपायभूतनिजशुद्धात्म-
तत्त्वभावनारूपनिश्चयतीर्थं तत्स्वरूपरतः परमतपोधनानां आवासभूतं तीर्थकदम्बकमपि मिथ्या-
तीर्थसमूहो वा, वेउ वि निर्दोषिपरमात्मोपदिष्टवेदशब्दवाच्यः सिद्धान्तोऽपि परकल्पितवेदो वा कव्वु
शुद्धजीवपदार्थादीनां गद्यपद्याकारेण वर्णकं काव्यं लोकप्रसिद्धविचित्रकथाकाव्यं वा, वच्छु
कहते हैं, वह भी विनश्वर है
जो आत्मतत्त्व उसको आदि ले जीव अजीवादि सकल पदार्थ उनका निरूपण करनेवाला जो
जैनशास्त्र वह भी यद्यपि अनादि प्रवृत्तिकी अपेक्षा नित्य है, तो भी वक्ता-श्रोता पुस्तकादिककी
अपेक्षा विनश्वर ही है, और जैन सिवाय जो सांख्य पातंजल आदि परशास्त्र हैं, वे भी विनाशीक
हैं