Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୩୪ ]ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ: [ ୪୩୯
ଭାଵାର୍ଥ: — ହେ ଆତ୍ମା! ଅନାଦିକାଳଥୀ ଦୁର୍ଲଭ, ଵୀତରାଗସର୍ଵଜ୍ଞପ୍ରଣୀତ, ରାଗ-ଦ୍ଵେଷ-ମୋହରହିତ,
ଜୀଵପରିଣାମସ୍ଵରୂପ, ଶୁଦ୍ଧୋପଯୋଗରୂପ, ନିଶ୍ଚଯଧର୍ମମାଂ ଅନେ ଛ ଆଵଶ୍ଯକାଦି ଵ୍ଯଵହାରଧର୍ମମାଂ ଅନେ
ଗୃହସ୍ଥନୀ ଅପେକ୍ଷାଏ ଦାନପୂଜାଦିରୂପ ଅଥଵା ଶୁଭୋପଯୋଗସ୍ଵରୂପ ଵ୍ଯଵହାରଧର୍ମମାଂ ରତି କର. ଆ ଧର୍ମମାଂ
ଜେ ପ୍ରତିକୂଳ ହୋଯ ତେ ମନୁଷ୍ଯ ପୋତାନା ଗୋତ୍ରମାଂ ଜନ୍ମେଲୋ ହୋଯ ତୋପଣ ତେନୋ ତ୍ଯାଗ କର, ଧର୍ମସନ୍ମୁଖ ତେମାଂ
(ଧର୍ମମାଂ) ଅନୁକୂଳ ହୋଯ ତେନେ ପରଗୋତ୍ରମାଂ ଜନ୍ମେଲୋ ହୋଯ ତୋପଣ, ପୋତାନୋ କର.
ଅହୀଂ, ଭାଵାର୍ଥ ଏମ ଛେ କେ ଜୀଵ ଵିଷଯସୁଖନେ ମାଟେ ଜେଵୋ ଅନୁରାଗ କରେ ଛେ ତେଵୋ
अरे जीव जिनपदे भक्तिं कुरु सुखं स्वजनं अपहर ।
तेन पित्रापि कार्यं नैव यः पातयति संसारे ।।१३४।।
अरि जिय इत्यादि । अरि जिय अहो भव्यजीव जिण-पइ भत्ति करि जिनपदे भक्तिं
कुरु गुणानुरागवचननिमित्तं जिनेश्वरेण प्रणीतश्रीधर्मे रतिं कुरु सुहि सज्जणु अवहेरि
संसारसुखसहकारिकारणभूतं स्वजनं गोत्रमप्यपहर त्यज । कस्मात् । तिं बप्पेण वि तेन
स्नेहितपित्रापि कज्जु णवि कार्यं नैव । यः किं करोति । जो पाडइ यः पातयति । क्व ।
संसारि संसारसमुद्रे । तथाच । हे आत्मन्, अनादिकाले दुर्लभे वीतरागसर्वज्ञप्रणीते रागद्वेष-
मोहरहिते जीवपरिणामलक्षणे शुद्धोपयोगरूपे निश्चयधर्मे व्यवहारधर्मे च पुनः षडावश्यकादि-
लक्षणे गृहस्थापेक्षया दानपूजादिलक्षणे व शुभोपयोगस्वरूपे रतिं कुरु । इत्थंभूते धर्मे प्रतिकूलो
यः तं मनुष्यं स्वगोत्रजमपि त्यज धर्मसन्मुखं तदनुकूलं परगोत्रजमपि स्वीकृर्विति । अत्रायं
गाथा – १३४
अन्वयार्थ : — [अरे जीव ] हे भव्य जीव, तू [जिनपदे ] जिनपदमें [भक्तिं कुरु ]
भक्तिकर, और जिनेश्वरके कहे हुए जिनधर्ममें प्रीति कर, [सुखं ] संसार सुखके निमित्तकारण
[स्वजनं ] जो अपने कुटुम्बके जन उनको [अपहर ] त्याग, अन्यकी तो बात क्या है ? [तेन
पित्रापि नैव कार्यं ] उसे महास्नेहरूप पितासे भी कुछ काम नहीं है, [यः ] जो [संसारे ]
संसार – समुद्रमें इस जीवको [पातयति ] पटक देवे ।
भावार्थ : — हे आत्माराम, अनादिकालसे दुर्लभ जो वीतराग सर्वज्ञका कहा हुआ राग
-द्वेष-मोहरहित शुद्धोपयोगरूप निश्चयधर्म और शुभोपयोगरूप व्यवहारधर्म, उनमें भी छह
आवश्यकरूप यतीका धर्म, तथा दान पूजादि श्रावकका धर्म, यह शुभाचाररूप दो प्रकार धर्म
उसमें प्रीति कर । इस धर्मसे विमुख जो अपने कुलका मनुष्य उसे छोड़, और इस धर्मके
सन्मुख जो पर कुटुम्बका भी मनुष्य हो उससे प्रीति कर । तात्पर्य यह है, कि यह जीव जैसे
विषय – सुखसे प्रीति करता है, वैसे जो जिनधर्म से करे तो संसारमें नहीं भटके । ऐसा दूसरी