Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-170 (Adhikar 2).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୪୯୪ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୧୭୦
३०१) जोइय मिल्लहि चिन्त जइ तो तुट्टइ संसारु
चिंतासत्तउ जिणवरु वि लहइ ण हंसाचारु ।।१७०।।
योगिन् मुञ्चसि चिन्तां यदि ततः त्रुटयति संसारः
चिन्तासक्त ो जिनवरोऽपि लभते न हंसाचरम् ।।१७०।।
जोइय इत्यादि जोइय हे योगिन् मिल्लहि मुञ्चसि काम् चिन्तारहिता-
द्विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावात्परमात्मपदार्थाद्विलक्षणां चिन्त जइ यदि चेत् तो ततश्चिन्ता-
भावात्
किं भवति तुट्टइ नश्यति स कः संसारु निःसंसारात् शुद्धात्मद्रव्याद्विलक्षणो
द्रव्यक्षेत्रकालादिभेदभिन्नः पञ्चप्रकारः संसारः यतः कारणात् चिंतासत्तउ जिणवरु वि
छद्मस्थावस्थायां शुभाशुभचिन्तासक्त ो जिनवरोऽपि लहइ लभते न कम् हंसाचारु
संशयविभ्रमविमोहरहितानन्तज्ञानादिनिर्मलगुणयोगेन हंस इव हंसः परमात्मा तस्याचारं
ଭାଵାର୍ଥ :ଵିଶୁଦ୍ଧଜ୍ଞାନ, ଵିଶୁଦ୍ଧଦର୍ଶନ ଜେନୋ ସ୍ଵଭାଵ ଛେ ଏଵା, ଚିଂତାରହିତ
ପରମାତ୍ମପଦାର୍ଥଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ ଚିଂତାନେ ଜୋ ତୁଂ ଛୋଡୀଶ ତୋ ଚିଂତାନା ଅଭାଵଥୀ ନିଃସଂସାର
ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମଦ୍ରଵ୍ଯଥୀ ଵିଲକ୍ଷଣ, ଦ୍ରଵ୍ଯ, କ୍ଷେତ୍ର, କାଳାଦି ପାଂଚ ପ୍ରକାରନା ଭେଦଥୀ ଭେଦଵାଳୋ ସଂସାର ନାଶ ପାମେ
ଛେ. କାରଣ କେ ଛଦ୍ମସ୍ଥ ଅଵସ୍ଥାମାଂ ଶୁଭାଶୁଭ ଚିଂତାସକ୍ତ ଜିନଵର ପଣ ସଂଶଯ, ଵିଭ୍ରମ,
ଵିମୋହରହିତ ଅନଂତଜ୍ଞାନାଦି ନିର୍ମଳ ଗୁଣଵାଳା ହୋଵାଥୀ ଜେ ହଂସ ଜେଵୋ ଛେ ଏଵୋ ଜେ ପରମାତ୍ମା ତେନା
ଆଚାରନେ ରାଗାଦି ରହିତ ଶୁଦ୍ଧାତ୍ମପରିଣାମନେ-ପାମତା ନଥୀ.
गाथा१७०
अन्वयार्थ :[योगिन् ] हे योगी, [यदि ] जो तू [चिंतां मुंचसि ] चिन्ताओंको
छोड़ेगा [ततः ] तो [संसारः ] संसारका भ्रमण [त्रुटयति ] छूट जायेगा, क्योंकि
[चिंतासक्तः ] चिन्तामें लगे हुए [जिनवरोऽपि ] छद्मस्थ अवस्थावाले तीर्थंकरदेव भी
[हंसाचारम् न लभते ] परमात्माके आचरणरूप शुद्ध भावोंको नहीं पाते
भावार्थ :हे योगी, निर्मल ज्ञान दर्शन स्वभाव परमात्मपदार्थसे पराङ्मुख जो चिंता
जाल उसे छोड़ेगा, तभी चिंताके अभावसे संसार भ्रमण टूटेगा शुद्धात्मद्रव्यसे विमुख द्रव्य,
क्षेत्र, काल, भव, भावरूप पाँच प्रकारके संसारसे तू मुक्त होगा जब तक चिंतावान् है, तब
तक निर्विकल्प ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती दूसरोंकी तो क्या बात है, जो तीर्थंकरदेव भी
केवल अवस्थाके पहले जब तक कुछ शुभाशुभ चिन्ताकर सहित हैं, तब तक वे भी रागादि
रहित शुद्धोपयोग परिणामोंको नहीं पा सकते
संशय विमोह विभ्रम रहित अनंत ज्ञानादि