Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୩୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦୦
सो जिण-देउ वि स जिनदेवोऽपि एवं भवति । न केवलं जिनदेवो भवति । परम-मुणि
परम उत्कृष्टो मुनिः प्रत्यक्षज्ञानी । किं कुर्वन् सन् । मुणंतु मन्यमानो जानन् सन् । कम्
परम-पयासु परममुत्कृष्टं लोकालोकप्रकाशकं केवलज्ञानं यस्य स भवति परमप्रकाशस्तं
परमप्रकाशम् । स कः । केवल-दंसणु णाणु सुहु वीरिउ जो जि केवलज्ञानदर्शनसुखवीर्यस्वरूपं
य एव । कथंभूतं तत् केवलज्ञानादिचतुष्टयम् । अणंतु युगपदनन्तद्रव्यक्षेत्रकालभाव-
परिच्छेदकत्वादविनश्वरत्वाच्चानन्तमिति भावार्थः ।।१९९।।
अथ —
३३१) जो परमप्पउ परम – पउ हरि हरु बंभु वि बुद्धु ।
परम पयासु भणंति मुणि सो जिण – देउ विसुद्धु ।।२००।।
यः परमात्मा परमपदः हरिः हरः ब्रह्मापि बुद्धः ।
परमप्रकाशः भणन्ति मुनयः स जिनदेवो विशुद्धः ।।२००।।
ଭାଵାର୍ଥ : — ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ଲୋକାଲୋକପ୍ରକାଶକ କେଵଳଜ୍ଞାନ ଜେନେ ଛେ ତେ ପରମ ପ୍ରକାଶକ ଛେ. ତେ
ପରମପ୍ରକାଶନେ ଜାଣତୋ ଥକୋ ଯୁଗପତ୍ ଅନଂତ ଦ୍ରଵ୍ଯ, କ୍ଷେତ୍ର, କାଳ ଅନେ ଭାଵନା ପରିଚ୍ଛେଦକ ହୋଵାଥୀ ତେମ
ଜ ଅଵିନଶ୍ଵର ହୋଵାଥୀ ଅନଂତ ଛେ ଏଵା କେଵଳଜ୍ଞାନ, କେଵଳଦର୍ଶନ, ସୁଖ ଅନେ ଵୀର୍ଯସ୍ଵରୂପ ଜେ ଛେ ତେ
ଜ ଜିନଦେଵ ଛେ, ତେମ ଜ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ମୁନି – ପ୍ରତ୍ଯକ୍ଷ ଜ୍ଞାନୀ – ଛେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୧୯୯.
ଵଳୀ, ହଵେ ଜିନଦେଵନାଂ ଅନେକ ନାମ ଛେ, ଏମ ନକ୍କୀ କରେ ଛେ : —
अनंतवीर्य [यदेव अनंतम् ] ये अनंतचतुष्टय जिसके हों [स जिनदेवः ] वही जिनदेव है,
[परममुनिः ] वही परममुनि अर्थात् प्रत्यक्ष ज्ञानी है । क्या करता संता । [परमप्रकाशं जानन् ]
उत्कृष्ट लोकालोकका प्रकाशक जो केवलज्ञान वही जिसके परमप्रकाश है, उससे सकल द्रव्य,
क्षेत्र, काल, भव, भावको जाना हुआ परमप्रकाशक है । ये केवलज्ञानादि अनंतचतुष्टय एक
ही समयमें अनंतद्रव्य, अनंतक्षेत्र, अनंतकाल और अनंतभावोंको जानते हैं, इसलिये अनंत हैं,
अविनश्वर हैं, इनका अंत नहीं है, ऐसा जानना ।।१९९।।
आगे जिनदेवके ही अनेक नाम हैं, ऐसा निश्चय करते हैं —
गाथा – २००
अन्वयार्थ : — [यः ] जिस [परमात्मा ] परमात्माको [मुनयः ] मुनि [परमपदः ]
परमपद [हरिः हरः ब्रह्मा अपि ] हरि महादेव ब्रह्मा [बुद्धः परमप्रकाशः भणंति ] बुद्ध और