Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୩୬ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦୨
अन्यदपि बन्धुरपि त्रिभुवनस्य शाश्वतसौख्यस्वभावः
तत्रैव सकलमपि कालं जीव निवसति लब्धस्वभावः ।।२०२।।
अण्णु वि इत्यादि अण्णु वि अन्यदपि पुनरपि स पूर्वोक्त : सिद्धः कथंभूतः बंध
वि बन्धुरेव कस्य तिहुयणहं त्रिभुवनस्थभव्यजनस्य पुनरपि किं विशिष्टः सासय-सुक्ख-
सहाउ रागादिरहिताव्याबाधशाश्वतसुखस्वभावः एवंगुणविशिष्टः सन् किं करोति स भगवान्
तित्थजि तत्रैव मोक्षपदे णिवसइ निवसति कथंभूतः सन् लद्ध-सहाउ लब्धशुद्धात्मस्वभावः
कियत्कालं निवसति सयलु वि क ालु समस्तमप्यनन्तानन्तकालपर्यन्तं िजय हे जीव इति
अत्रानेन समस्तकालग्रहणेन विमुक्तं भवति ये केचन वदन्ति मुक्त ानां पुनरपि संसारे पतनं
भवति तन्मतं निरस्तमिति भावार्थः ।।२०२।।
अथ
गाथा२०२
अन्वयार्थ :[अन्यदपि ] फि र वे सिद्धभगवान् [त्रिभुवनस्य ] तीन लोकके
प्राणियोंका [बंधुरपि ] हित करनेवाले हैं, [शाश्वतसुखस्वभावः ] और जिनका स्वभाव
अविनाशी सुख है, और [तत्रैव ] उसी शुद्ध क्षेत्रमें [लब्धस्वभावः ] निजस्वभावको पाकर
[जीव ] हे जीव, [सकलमपि कालं ] सदा काल [निवसति ] निवास करते हैं, फि र चतुर्गतिमें
नहीं आवेंगे
भावार्थ :सिद्धपरमेष्ठी तीनलोकके नाथ हैं, और जिनका भव्यजीव ध्यान करके
भवसागरसे पार होते हैं, इसलिये भव्योंके बंधु हैं, हितकारी हैं जिनका रागादि रहित अव्याबाध
अविनाशी सुख स्वभाव है ऐसे अनन्त गुणरूप वे भगवान् उस मोक्ष पदमें सदा काल विराजते
हैं जिन्होंने शुद्ध आत्मस्वभाव पा लिया है अनन्तकाल बीत गये, और अनन्तकाल आवेंगे,
परंतु वे प्रभु सदाकाल सिद्धक्षेत्रमें बस रहे हैं समस्त काल रहते हैं, इसके कहनेका प्रयोजन
यह है, कि जो कोई ऐसा कहते हैं, कि मुक्तजीवोंका भी संसारमें पतन होता है, सो उनका
कहना खंडित किया गया ।।२०२।।
ଭାଵାର୍ଥ :ଵଳୀ ତେ ପୂର୍ଵୋକ୍ତ ସିଦ୍ଧ ଭଗଵାନ ତ୍ରଣ ଲୋକମାଂ ରହେଲା ଭଵ୍ଯ ଜନନେ ବଂଧୁ ଜ
ଛେ. ରାଗାଦି ରହିତ ଅଵ୍ଯାବାଧ ଶାଶ୍ଵତ ସୁଖସ୍ଵଭାଵ ଜେନୋ ଛେ ଏଵା ଗୁଣଵିଶିଷ୍ଟ ତେ ଭଗଵାନ ଶୁଦ୍ଧ
ଆତ୍ମସ୍ଵଭାଵନେ ପାମୀନେ ମୋକ୍ଷପଦମାଂ ସମସ୍ତ କାଳ ସୁଧୀ-ଅନଂତାନଂତ କାଳ ସୁଧୀ ଵସେ ଛେ.
ଅହୀଂ ‘ସମସ୍ତ କାଳ ଵିମୁକ୍ତ ରହେ ଛେ’ ଏ କଥନଥୀ ଜେ କୋଈ କହେ ଛେ କେ ମୁକ୍ତ ଜୀଵୋନୁଂ
ଫରୀଥୀ ସଂସାରମାଂ ପତନ ଥାଯ ଛେ’ ତେନା ମତନୁଂ ଖଂଡନ କର୍ଯୁଂ ଛେ, ଏଵୋ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୦୨.