Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration). Gatha-204 (Adhikar 2) Paramatmaprakashnu Phal.

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୩୮ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୦୪
गच्छति क्व तित्थु जि तत्रैव मोक्षपदे पुनरपि किंविशिष्टः सन् मुक्कु ज्ञानावरणाद्यष्ट-
कर्मनिर्मुक्त ो रहितः अव्याबाधाद्यनन्तगुणैः सहितश्चेति भावार्थः ।।२०३।। एवं चतुर्विंशतिसूत्र-
प्रमितमहास्थलमध्ये सिद्धपरमेष्ठिव्याख्यानमुख्यत्वेन सूत्रत्रयेण चतुर्थमन्तरस्थलं गतम्
अथानन्तरं परमात्मप्रकाशभावनारतपुरुषाणां फ लं दर्शयन् सूत्रत्रयपर्यन्तं व्याख्यानं
करोति तथाहि
३३५) जे परमप्प-पयासु मुणि भाविं भावहिँ सत्थु
मोहु जिणेविणु सयलु जिय ते बुज्झहिँ परमत्थु ।।२०४।।
ये परमात्मप्रकाशं मुनयः भावेन भावयन्ति शास्त्रम्
मोहं जित्वा सकलं जीव ते बुध्यन्ति परमार्थम् ।।२०४।।
अनंतदर्शन, अनंतसुख और अनंतवीर्यमयी है ऐसे अनेक गुणोंके सागर भगवान् सिद्धपरमेष्ठी
स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल, स्वभावरूप चतुष्टयमें निवास करते हुए सदा आनंदरूप लोकके
शिखर पर विराज रहे हैं, जिसका कभी अंत नहीं, उसी सिद्धपदमें सदा काल विराजते हैं,
केवलज्ञान दर्शन कर घट
घटमें व्यापक हैं सकल कर्मोपाधि रहित महा निरुपाधि
निराबाधपना आदि अनंतगुणों सहित मोक्षमें आनंद विलास करते हैं ।।२०३।।
इस तरह चौबीस दोहोंवाले महास्थलमें सिद्धपरमेष्ठीके व्याख्यानकी मुख्यताकर तीन
दोहोंमें चौथा अंतरस्थल कहा
आगे तीन दोहोंमें परमात्मप्रकाशकी भावनामें लीन पुरुषोंके फ लको दिखाते हुए
व्याख्यान करते हैं
गाथा२०४
अन्वयार्थ :[ये मुनयः ] जो मुनि [भावेन ] भावोंसे [परमात्मप्रकाशं शास्त्रम् ]
ଅଵ୍ଯାବାଧାଦି ଅନଂତଗୁଣୋଥୀ ସହିତ ଥଯା ଥକା, ପୋତାନା ସ୍ଵାଭାଵିକ ଅନଂତଜ୍ଞାନାଦି ଗୁଣୋ ସାଥେ
ଵୃଦ୍ଧିନେ ପାମେ ଛେ, ଏ ଭାଵାର୍ଥ ଛେ. ୨୦୩.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଚୋଵୀସ ସୂତ୍ରୋନା ମହାସ୍ଥଳମାଂ ସିଦ୍ଧପରମେଷ୍ଠୀନା ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନନୀ ମୁଖ୍ଯତାଥୀ ତ୍ରଣ
ଗାଥାସୂତ୍ରୋଥୀ ଚୋଥୁଂ ଅନ୍ତରସ୍ଥଳ ସମାପ୍ତ ଥଯୁଂ.
ତ୍ଯାର ପଛୀ ତ୍ରଣ ସୂତ୍ରୋ ସୁଧୀ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶନୀ ଭାଵନାମାଂ ରତ ପୁରୁଷୋନେ ଜେ ଫଳ ଥାଯ ଛେ
ତେ ଦର୍ଶାଵତୁଂ, ଵ୍ଯାଖ୍ଯାନ କରେ ଛେ. ତେ ଆ ପ୍ରମାଣେ :