Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Oriya transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ଶ୍ରୀ ଦିଗଂବର ଜୈନ ସ୍ଵାଧ୍ଯାଯମଂଦିର ଟ୍ରସ୍ଟ, ସୋନଗଢ - ୩୬୪୨୫୦
୫୫୨ ]ଯୋଗୀନ୍ଦୁଦେଵଵିରଚିତ: [ ଅଧିକାର-୨ : ଦୋହା-୨୧୪
बोहो केवलज्ञानाभिधानः कोऽप्यपूर्वो बोधः कथंभूतः सिव-सरूवो शिवशब्दवाच्यं यदनन्तसुखं
तत्स्वरूपः पुनरपि कथंभूतः दुल्लहो जो हु लोए दुर्लभो दुष्प्राप्यः यः स्फु टम् क्व लोके
केषां दुर्लभः विसय-सुह-रयाणं विषयसुखातीतपरमात्मभावनोत्पन्नपरमानन्दैकरूपसुखास्वाद-
रहितत्वेन पञ्चेन्द्रियविषयासक्त ानामिति भावार्थः ।।२१४।।
इति ‘परु जाणंतु वि परममुणि परसंसग्गु चयंति’ इत्याद्येकाशीतिसूत्रपर्यन्तं
सामान्यभेदभावना तदनन्तरं ‘परमसमाहि’ इत्यादि चतुर्विंशतिसूत्रपर्यन्तं महास्थलं, तदनन्तरं
वृत्तद्वयं चेति सर्वसमुदायेन सप्ताधिकसूत्रशतेन द्वितीयमहाधिकारे चूलिका गतेति
।। एवमत्र
परमात्मप्रकाशाभिधानग्रन्थेन प्रथमस्तावत् ‘जे जाया झाणग्गियए’ इत्यादि त्रयोविंशत्यधिक-
सूत्रशतेन प्रक्षेपकत्रयसहितेन प्रथममहाधिकारो गतः
तदनन्तरं चतुर्दशाधिकशतद्वयेन प्रक्षेपक-
पञ्चकसहितेन द्वितीयोऽपि महाधिकारो गतः एवं पञ्चाधिकचत्वारिंशत्सहितशतत्रय-
जो परमात्मतत्त्व [दुर्लभः ] महा दुर्लभ है
भावार्थ :इस लोकमें विषयी जीव जिसको नहीं पा सकते, ऐसा वह परमात्मतत्त्व
जयवंत होवे ।।२१४।।
इसप्रकार परमात्मप्रकाश ग्रंथमें पहले ‘जे जाया झाणग्गियए’ इत्यादि एकसौ
तेबीस दोहे तीन प्रक्षेपकों सहित ऐसे १२६ दोहोंमें पहला अधिकार समाप्त हुआ एकसौ
चौदह ११४ दोहे तथा ५ प्रक्षेपक सहित ११९ दोहोंमें दूसरा महाधिकार कहा और ‘परु
जाणंतु वि’ इत्यादि एकसौ सात १०७ दोहोंमें तीसरा महाधिकार कहा प्रक्षेपक और
ଦିଵ୍ଯଯୋଗ ଜଯଵଂତ ଵର୍ତୋ. (୩) ଵିଷଯସୁଖଥୀ ରହିତ ଏଵା ପରମାତ୍ମାନୀ ଭାଵନାଥୀ ଉତ୍ପନ୍ନ
ପରମାନଂଦ ଜେନୁଂ ଏକ ରୂପ ଛେ ଏଵା ସୁଖନା ଆସ୍ଵାଦଥୀ ରହିତ ଏଵା ପଂଚେନ୍ଦ୍ରିଯ ଵିଷଯୋମାଂ ଆସକ୍ତ
ଜୀଵୋନେ ଲୋକମାଂ ଖରେଖର ଜେ ଦୁଷ୍ପ୍ରାପ୍ଯ ଛେ ଏଵୋ, ‘ଶିଵ’ ଶବ୍ଦଥୀ ଵାଚ୍ଯ ଏଵୁଂ ଜେ ଅନଂତସୁଖ ତେ
ସ୍ଵରୂପ କେଵଳଜ୍ଞାନ ନାମନୋ କୋଈ ଅପୂର୍ଵ ବୋଧ ଛେ ତେ ଲୋକମାଂ ଜଯଵଂତ ଵର୍ତୋ. ୨୧୪.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ‘परु जाणंतु वि परममुणि परसंसग्गु चयंति’ ଇତ୍ଯାଦି ୮୧ ସୂତ୍ର ସୁଧୀ
ସାମାନ୍ଯଭେଦଭାଵନା, ତେନା ପଛୀ ‘परमसमाहि’ ଇତ୍ଯାଦି ୨୪ ସୂତ୍ର ସୁଧୀ ମହାସ୍ଥଳ, ତେନା ପଛୀ ବେ
ଛଂଦ ଏମ ସର୍ଵ ମଳୀ ୧୦୭ ସୂତ୍ରଥୀ ବୀଜା ମହାଧିକରଣମାଂ ଚୂଲିକା ସମାପ୍ତ ଥଈ.
ଏ ପ୍ରମାଣେ ଆ ପରମାତ୍ମପ୍ରକାଶ ନାମନା ଗ୍ରଂଥମାଂ ପ୍ରଥମ ତୋ ‘जे जाया झाणग्गियए’
ଇତ୍ଯାଦି ୧୨୩ ତ୍ରଣ ପ୍ରକ୍ଷେପକ ସହିତ (୧୨୬) ଦୋହାସୂତ୍ରଥୀ ପହେଲୋ ମହାଧିକାର ସମାପ୍ତ ଥଯୋ.
ତ୍ଯାରପଛୀ ୨୧୪ ପାଂଚ ପ୍ରକ୍ଷେପକ ସହିତ (୨୧୯) ଦୋହାସୂତ୍ରଥୀ ବୀଜୋ ମହାଧିକାର ସମାପ୍ତ ଥଯୋ.