Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-111 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
੧੮੦ ]ਯੋਗੀਨ੍ਦੁਦੇਵਵਿਰਚਿਤ: [ ਅਧਿਕਾਰ-੧ : ਦੋਹਾ-੧੧੧
पुनरपि कथंभूतः ज्ञानमयः केवलज्ञानेन निर्वृत्तः सो वुच्चइ परलोउ स एवंगुणविशिष्टः
शुद्धात्मा परलोक इत्युच्यते इति पर उत्कृष्टो वीतरागचिदानन्दैकस्वभाव आत्मा तस्य
लोकोऽवलोकनं निर्विकल्पसमाधौ वानुभवनमिति परलोकशब्दस्यार्थंः, अथवा लोक्यन्ते
द्रश्यन्ते जीवादिपदार्था यस्मिन् परमात्मस्वरूपे यस्य केवलज्ञानेन वा स भवति लोकः
परश्चासौ लोकश्च परलोकः व्यवहारेण पुनः स्वर्गापवर्गलक्षणः परलोको भण्यते अत्र
योऽसौ परलोकशब्दवाच्यः परमात्मा स एवोपादेय इति तात्पर्यार्थः ।।११०।। अथ
१११) सो पर वुच्चइ लोउ परु जसु मइ तित्थु वसेइ
जहिँ मइ तहिँ गइ जीवह जि णियमेँ जेण हवेइ ।।१११।।
सः परः उच्यते लोकः परः यस्य मतिः तत्र वसति
यत्र मतिः तत्र गतिः जीवस्य एव नियमेन येन भवति ।।१११।।
परलोक है अथवा जिसके परमात्मस्वरूपमें या केवलज्ञानमें जीवादि पदार्थ देखे जावें,
इसलिये उस परमात्माका नाम परलोक है अथवा व्यवहारनयकर स्वर्ग-मोक्षको परलोक कहते
हैं स्वर्ग और मोक्षका कारण भगवानका धर्म है, इसलिये केवली भगवान्को परलोक कहते
हैं परमात्माके समान अपना निज आत्मा है, वही परलोक है, वही उपादेय है ।।११०।।
आगे ऐसा कहते हैं, जिसका मन निज आत्मामें बस रहा है, वही ज्ञानी जीव परलोक
है
गाथा१११
अन्वयार्थ :[यस्य मतिः ] जिस भव्य जीवकी बुद्धि [तत्र ] उस निज
आत्मस्वरूपमें [वसति ] बस रही है, अर्थात् विषय-कषाय-विकल्प-जालके त्यागसे
स्वसंवेदन
ज्ञानस्वरूपकर स्थिर हो रही है [स ] वह पुरुष [परः ] निश्चयनयकर [परः
ਸ਼ਬ੍ਦਨੋ ਅਰ੍ਥ ਛੇ, ਅਥਵਾ ਜੇ ਪਰਮਾਤ੍ਮਸ੍ਵਰੂਪਮਾਂ ਅਥਵਾ ਜੇਨਾ ਕੇਲ਼ਵਜ੍ਞਾਨਥੀ ਜੀਵਾਦਿ ਪਦਾਰ੍ਥੋ ਦੇਖਾਯ
ਛੇ-ਜਣਾਯ ਛੇ ਤੇ ਲੋਕ ਛੇ ਪਰਮ ਲੋਕ (ਪਰਮਾਤ੍ਮਾ) ਪਰਲੋਕ ਛੇ, ਅਨੇ ਵ੍ਯਵਹਾਰਨਯਥੀ ਸ੍ਵਰ੍ਗਮੋਕ੍ਸ਼ਨੇ
ਪਰਲੋਕ ਕਹ੍ਯੋ ਛੇ.
ਅਹੀਂ, ‘ਪਰਲੋਕ’ ਸ਼ਬ੍ਦਥੀ ਵਾਚ੍ਯ ਏਵੋ ਜੇ ਪਰਮਾਤ੍ਮਾ ਛੇ ਤੇ ਜ ਉਪਾਦੇਯ ਛੇ, ਏਵੋ ਤਾਤ੍ਪਰ੍ਯਾਰ੍ਥ
ਛੇ. ੧੧੦.
ਹਵੇ, ਜੇਨੁਂ ਮਨ ਨਿਜ ਆਤ੍ਮਾਮਾਂ ਵਸੇ ਛੇ ਤੇ ਜ੍ਞਾਨੀ ਜੀਵ ਪਰਲੋਕ ਛੇ, ਏਮ ਕਹੇ ਛੇ :