Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Punjabi transliteration). Gatha-117 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
੧੮੮ ]ਯੋਗੀਨ੍ਦੁਦੇਵਵਿਰਚਿਤ: [ ਅਧਿਕਾਰ-੧ : ਦੋਹਾ-੧੧੬
मुक्त्वा कम् देउ देवम् कथंभूतम् अणंतु अनन्तशब्दवाच्यपरमात्मपदार्थमिति तथाहि
शिवशब्देनात्र विशुद्धज्ञानस्वभावो निजशुद्धात्मा ज्ञातव्यः तस्य दर्शनमवलोकनमनुभवनं तस्मिन्
शिवदर्शने परमसुखं निजशुद्धात्मभावनोत्पन्नवीतरागपरमाह्लादरूपं लभसे
किं कुर्वन् सन्
वीतरागनिर्विकल्पत्रिगुप्तिसमाधिं कुर्वन् इत्थंभूतं सुखं अनन्तशब्दवाच्यो योऽसौ परमात्मपदार्थस्तं
मुक्त्वा त्रिभुवनेऽपि नास्तीति अयमत्रार्थः शिवशब्दवाच्यो योऽसौ निजपरमात्मा स एव
रागद्वेषमोहपरिहारेण ध्यातः सन्ननाकुलत्वलक्षणं परमसुखं ददाति नान्यः कोऽपि शिवनामेति
पुरुषः
।।।।११६।। अथ
११७) जं मुणि लहइ अणंतसुहु णियअप्पा झायंतु
तं सुहु इंदु वि णवि लहइ देविहिँ कोडि रमंतु ।।११७।।
तीनलोकमें नहीं है वह सुख क्या है ? जो निर्विकल्प वीतराग परम आनंदरूप शुद्धात्मभाव
है, वही सुखी है क्या करता हुआ यह सुख पाता है कि तीन गुप्तिरूप परमसमाधिमें आरूढ़
हुआ सता ध्यानी पुरुष ही उस सुखको पाता है अनंत गुणरूप आत्म-तत्त्वके बिना वह सुख
तीनों लोकके स्वामी इन्द्रादिको भी नहीं है इस कारण सारांश यह निकला कि शिव नामवाला
जो निज शुद्धात्मा है, वही राग-द्वेष मोहके त्यागकर ध्यान किया गया आकुलता रहित परम
सुखको देता है
संसारी जीवोंके जो इन्द्रियजनित सुख है, वह आकुलतारूप है, और आत्मीक
अतीन्द्रियसुख आकुलता रहित है, सो सुख ध्यानसे ही मिलता है, दूसरा कोई शिव या ब्रह्मा
या विष्णु नामका पुरुष देनेवाला नहीं है
आत्माका ही नाम शिव है, विष्णु है, ब्रह्मा है ।।११६।।
आगे कहते हैं कि जो सुख आत्माको ध्यावनेसे महामुनि पाते हैं, वह सुख इन्द्रादि
देवोंको दुर्लभ है
ਅਵਲੋਕਨਅਨੁਭਵਨਤੇਮਾਂ ਨਿਜਸ਼ੁਦ੍ਧਾਤ੍ਮਾਨੀ ਭਾਵਨਾਥੀ ਉਤ੍ਪਨ੍ਨ ਵੀਤਰਾਗ ਪਰਮ ਆਹ੍ਲਾਦਰੂਪ ਪਰਮ
ਸੁਖ ਤੁਂ ਪਾਮੀ ਸ਼ਕੇ ਤੇਵੁਂ ਸੁਖ, ‘ਅਨਂਤ’ ਸ਼ਬ੍ਦਥੀ ਵਾਚ੍ਯ ਏਵੋ ਜੇ ਆ ਪਰਮਾਤ੍ਮਪਦਾਰ੍ਥ ਛੇ ਤੇਨੇ ਛੋਡੀਨੇ,
ਤ੍ਰਣ ਭੁਵਨਮਾਂ (ਕ੍ਯਾਂਯ ਪਣ) ਨਥੀ.
ਅਹੀਂ, ਏ ਅਰ੍ਥ ਛੇ ਕੇ ‘ਸ਼ਿਵ’ ਸ਼ਬ੍ਦਥੀ ਵਾਚ੍ਯ ਏਵੋ ਜੇ ਨਿਜਪਰਮਾਤ੍ਮਾ ਛੇ ਤੇ ਜ
ਰਾਗਦ੍ਵੇਸ਼ਮੋਹਨਾ ਤ੍ਯਾਗ ਵਡੇ ਧ੍ਯਾਨ ਕਰਵਾਮਾਂ ਆਵਤਾਂ, ਅਨਾਕੁਲ਼ਤਾ ਜੇਨੁਂ ਲਕ੍ਸ਼ਣ ਛੇ ਏਵਾ ਪਰਮਸੁਖਨੇ
ਆਪੇ ਛੇ; ਬੀਜੋ ਕੋਈ ‘ਸ਼ਿਵ’ ਨਾਮਨੋ ਪੁਰੁਸ਼ ਪਰਮਸੁਖਨੇ ਆਪਤੋ ਨਥੀ. ੧੧੬.
ਹਵੇ, ਕਹੇ ਛੇ ਕੇ ਜੇ ਸੁਖ ਆਤ੍ਮਾਨੁਂ ਧ੍ਯਾਨ ਕਰਵਾਥੀ ਮਹਾਮੁਨਿ ਪਾਮੇ ਛੇ ਤੇ ਸੁਖ ਇਨ੍ਦ੍ਰਾਦਿ
ਦੇਵੋਨੇ ਦੁਰ੍ਲਭ ਛੇ :