Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ਸ਼੍ਰੀ ਦਿਗਂਬਰ ਜੈਨ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਮਂਦਿਰ ਟ੍ਰਸ੍ਟ, ਸੋਨਗਢ - ੩੬੪੨੫੦
दुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराभिधानानां नवानां गुणानामभावं मोक्षं मन्यन्ते ये
वृद्धवैशेषिकास्ते निषिद्धाः । ये च प्रदीपनिर्वाणवज्जीवाभावं मोक्षं मन्यते सोगतास्ते च निरस्ताः ।
यच्चोक्त सांख्यैः सुप्तावस्थावत् सुखज्ञानरहितो मोक्षस्तदपि निरस्तम् । लोकाग्रे तिष्ठतीति वचनेन
तु मण्डिकसंज्ञा नैयायिकमतान्तर्गता यत्रैव मुक्त स्तत्रैव तिष्ठतीति वदन्ति तेऽपि निरस्ता इति ।
जैनमते पुनरिन्द्रियजनितज्ञानसुखस्याभावे न चातीन्द्रियज्ञानसुखस्येति कर्मजनितेन्द्रियादिदश-
इन नव गुणोंके अभावरूप मोक्ष है, उनका निषेध किया, क्योंकि इंद्रियजनित बुद्धिका तो
अभाव है, परंतु केवल बुद्धि अर्थात् केवलज्ञानका अभाव नहीं है, इंद्रियोंसे उत्पन्न सुखका
अभाव है, लेकिन अतीन्द्रिय सुखकी पूर्णता है, दुःख, इच्छा, द्वेष, यत्न इन विभावरूप गुणोंका
तो अभाव ही है, केवलरूप परिणमन है, व्यवहार – धर्मका अभाव ही है, और वस्तुका
स्वभावरूप धर्म वह ही है, अधर्मका तो अभाव ठीक ही है, और परद्रव्यरूप – संस्कार सर्वथा
नहीं है, स्वभाव – संस्कार ही है । जो मूढ़ इन गुणोंका अभाव मानते हैं, वे वृथा बकते हैं, मोक्ष
तो अनंत गुणरूप है । इस तरह निर्गुणवादियोंका निषेध किया । तथा बौद्धमती जीवके
अभावको मोक्ष कहते हैं । वे मोक्ष ऐसा मानते हैं कि जैसे दीपकका निर्वाण (बुझना) उसी
तरह जीवका अभाव वही मोक्ष है । ऐसी बौद्धकी श्रद्धाका भी तिरस्कार किया । क्योंकि जो
जीवका ही अभाव हो गया, तो मोक्ष किसको हुआ ? जीवका शुद्ध होना वह मोक्ष है, अभाव
कहना वृथा है । सांख्यदर्शनवाले ऐसा कहते हैं कि जो एकदम सोनेकी अवस्था है, वही मोक्ष
है, जिस जगह न सुख है, न ज्ञान है, ऐसी प्रतीतिका निवारण किया । नैयायिक ऐसा कहते
हैं कि जहाँसे मुक्त हुआ वहीं पर ही तिष्ठता है, ऊ परको गमन नहीं करता । ऐसे नैयायिकके
कथनका लोक – शिखर पर तिष्ठता है, इस वचनसे निषेध किया । जहाँ बंधनसे छूटता है, वहाँ
वह नहीं रहता, यह प्रत्यक्ष देखने में आता है, जैसे कैदी कैदसे जब छूटता है, तब बंदीगृहसे
छूटकर अपने घरकी तरफ गमन करता है, वह निजघर निर्वाण ही है । जैन – मार्गमें तो
(੨)ਜੇਮ ਦੀਵਾਨੁਂ ਬੁਝਾਵੁਂ ਤੇ ਨਿਰ੍ਵਾਣ ਛੇ ਤੇਮ ਜੀਵਨੋ ਅਭਾਵ ਤੇ ਮੋਕ੍ਸ਼ ਛੇ ਤੇਮ ਬੌਦ੍ਧੋ ਮਾਨੇ
ਛੇ, ਤੇਨੁਂ ਖਂਡਨ ਕਰਵਾਮਾਂ ਆਵ੍ਯੁਂ ਛੇ.
(੩)ਸਾਂਖ੍ਯਦਰ੍ਸ਼ਨਵਾਲ਼ਾ ਏਮ ਕਹੇ ਛੇ ਕੇਸੁਪ੍ਤ-ਅਵਸ੍ਥਾਨੀ ਸਮਾਨ ਸੁਖ ਜ੍ਞਾਨਥੀ ਰਹਿਤ ਤੇ ਮੋਕ੍ਸ਼
ਛੇ, ਤੇਨੁਂ ਪਣ ਖਂਡਨ ਕਰ੍ਯੁਂ ਛੇ.
(੪)‘ਲੋਕਾਗ੍ਰੇ ਰਹੇ ਛੇ’ ਏ ਵਚਨ ਵਡੇ ‘ਜੀਵ ਜ੍ਯਾਂ ਮੁਕ੍ਤ ਥਾਯ ਛੇ ਤ੍ਯਾਂ ਜ ਰਹੇ ਛੇ’ ਏਮ ਮਂਡਿਕ
ਨਾਮਨਾ ਨੈਯਾਯਿਕੋ ਕਹੇ ਛੇ, ਤੇਮਨੁਂ ਪਣ ਖਂਡਨ ਥਯੁਂ.
ਵਲ਼ੀ, ਜੈਨਮਤਮਾਂ ਤੋ (ਮੋਕ੍ਸ਼ਮਾਂ) ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਜਨਿਤ ਜ੍ਞਾਨ ਅਨੇ ਸੁਖਨੋ ਅਭਾਵ ਥਤਾਂ ਕਾਂਈ
ਅਤੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਜ੍ਞਾਨ ਅਨੇ ਅਤੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਸੁਖਨੋ ਅਭਾਵ ਥਤੋ ਨਥੀ, ਅਨੇ ਕਰ੍ਮਜਨਿਤ ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਦਿ ਦਸ਼ ਪ੍ਰਾਣ-
ਅਧਿਕਾਰ-੨ : ਦੋਹਾ-੬ ]ਪਰਮਾਤ੍ਮਪ੍ਰਕਾਸ਼: [ ੨੦੯