Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Tamil transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ஶ்ரீ திகஂபர ஜைந ஸ்வாத்யாயமஂதிர ட்ரஸ்ட, ஸோநகட - ௩௬௪௨௫௦
௧௩௮ ]யோகீந்துதேவவிரசித: [ அதிகார-௧ : தோஹா-௮௧
गाथा८१
अन्वयार्थ :[मूढः ] मिथ्यादृष्टि अपनेको [विशेषम् मनुते ] ऐसा विशेष मानता
है, कि [अहं ] मैं [वरः ब्राह्मणः ] सबमें श्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ, [अहं ] मैं [वैश्यः ] वणिक् हूँ,
[अहं ] मैं [क्षत्रियः ] क्षत्री हूँ, [अहं ] मैं [शेषः ] इनके सिवाय शूद्र हूँ, [अहं ] मैं [पुरुषः
नपुंसकः स्त्री ] पुरुष हूँ, और स्त्री हूँ
इसप्रकार शरीरके भावोंको मूर्ख अपने मानता है
सो ये सब शरीरके हैं, आत्माके नहीं हैं
भावार्थ :यहाँ पर ऐसा है कि निश्चयनयसे ये ब्राह्मणादि भेद कर्मजनित हैं,
परमात्माके नहीं हैं, इसलिये सब तरह आत्मज्ञानीके त्याज्यरूप हैं तो भी जो निश्चयनयकर
आराधने योग्य वीतराग सदा आनंदस्वभाव निज शुद्धात्मामें इन भेदोंको लगाता हैं, अर्थात्
अपनेको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र मानता है; स्त्री, पुरुष, नपुंसक, मानता है, वह कर्मोंका
बंध करता है, वही अज्ञानसे परिणत हुआ निज शुद्धात्म तत्त्वकी भावनासे रहित हुआ मूढात्मा
हैं, ज्ञानवान् नहीं है
।।८१।।
आगे फि र मूढ़के लक्षण कहते हैं
अहं वरः ब्राह्मणः वैश्यः अहं अहं क्षत्रियः अहं शेषः
पुरुषः नपुंसकः स्त्री अहं मन्यते मूढः विशेषम् ।।८१।।
हउं वरु बंभणु वइसु हउं हउं खत्तिउ हउं सेसु अहं वरो विशिष्टो ब्राह्मणः अहं
वैश्यो वणिग् अहं क्षत्रियोऽहं शेषः शूद्रादि पुनश्च कथंभूतः पुरिसु णउं सउ इत्थि हउं मण्णइ
मूढु विसेसु पुरुषो नपुंसकः स्त्रीलिङ्गोऽहं मन्यते मूढो विशेषं ब्राह्मणादिविशेषमिति इदमत्र
तात्पर्यम् यन्निश्चयनयेन परमात्मनो भिन्नानपि कर्मजनितान् ब्राह्मणादिभेदान् सर्वप्रकारेण
हेयभूतानपि निश्चयनयेनोपादेयभूते वीतरागसदानन्दैकस्वभावे स्वशुद्धात्मनि योजयति संबद्धान्
करोति
कोऽसौ कथंभूतः अज्ञानपरिणतः स्वशुद्धात्मतत्त्वभावनारहितो मूढात्मेति ।।८१।।
अथ
பாவார்த:அஜ்ஞாநரூபே பரிணமேலோ, ஸ்வஶுத்தாத்மதத்த்வநீ பாவநாதீ ரஹித மூடாத்மா,
நிஶ்சயநயதீ பரமாத்மாதீ பிந்ந ஹோவா சதாஂ பண, ஸர்வப்ரகாரே ஹேயபூத ஹோவா சதாஂ பண, கர்மஜநித
ப்ராஹ்மணாதி பேதோநே, நிஶ்சயநயதீ உபாதேயபூத வீதராக ஸதாநஂத ஜ ஜேநோ ஏக ஸ்வபாவ சே ஏவா
ஸ்வஶுத்தாத்மாமாஂ ஜோடே சே
ஸஂபஂத கரே சே, ஏ தாத்பயார்த சே. ௮௧.
வளீ, (பரீ மூடாத்மாநுஂ லக்ஷண கஹே சே : ) :