Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Tamil transliteration). Gatha-86 (Adhikar 1).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
ஶ்ரீ திகஂபர ஜைந ஸ்வாத்யாயமஂதிர ட்ரஸ்ட, ஸோநகட - ௩௬௪௨௫௦
௧௪௪ ]யோகீந்துதேவவிரசித: [ அதிகார-௧ : தோஹா-௮௬
भेदभावनां करोति ताद्रशीं क्रमेण सूत्रसप्तकेन विवृणोति
८६) अप्पा गोरउ किण्हु ण वि अप्पा रत्तु ण होइ
अप्पा सुहुमु वि थूलु ण वि णाणिउ जाणेँ जोइ ।।८६।।
आत्मा गौरः कृष्णः नापि आत्मा रक्त : न भवति
आत्मा सूक्ष्मोऽपि स्थूलः नापि ज्ञानी ज्ञानेन पश्यति ।।८६।।
आत्मा गौरो न भवति रक्त ो न भवति आत्मा सूक्ष्मोऽपि न भवति स्थूलोऽपि नैव
तर्हि किंविशिष्टः ज्ञानी ज्ञानस्वरूपः ज्ञानेन करणभूतेन पश्यति अथवा ‘णाणिउ जाणइ
जोइं’ इति पाठान्तरं, ज्ञानी योऽसौ योगी स जानात्यात्मानम् अथवा ज्ञानी ज्ञानस्वरूपेण
आत्मा कोऽसौ जानाति योगीति तथाहिकृष्णगौरादिकधर्मान् व्यवहारेण जीवसंबद्धानपि
तथापि शुद्धनिश्चयेन शुद्धात्मनो भिन्नान् कर्मजनितान् हेयान् वीतरागस्वसंवेदनज्ञानी
स्वशुद्धात्मतत्त्वे तान् न योजयति संबद्धान्न करोतीति भावार्थः
।।८६।। अथ
भेदविज्ञानकी भावनाको करता है, वैसी भेदविज्ञान-भावनाका स्वरूप क्रमसे सात दोहा-सूत्रोंमें
कहते हैं
गाथा८६
अन्वयार्थ :[आत्मा ] आत्मा [गौरः कृष्णः नापि ] सफे द नहीं है, काला नहीं है,
[आत्मा ] आत्मा [रक्तः ] लाल [न भवति ] नहीं है, [आत्मा ] आत्मा [सूक्ष्मः अपि स्थूलः
नैव ] सूक्ष्म भी नहीं है, और स्थूल भी नहीं है, [ज्ञानी ] ज्ञानस्वरूप है, [ज्ञानेन ] ज्ञानदृष्टिसे
[पश्यति ] देखा जाता है, अथवा ज्ञानी पुरुष योगी ही ज्ञानकर आत्माको जानता है
।।
भावार्थ :ये श्वेत काले आदि धर्म व्यवहारनयकर शरीरके सम्बन्धसे जीवके कहे
जाते हैं, तो भी शुद्धनिश्चयनयकर शुद्धात्मासे जुदे हैं, कर्मजनित हैं, त्यागने योग्य हैं जो वीतराग
स्वसंवेदन ज्ञानी है, वह निज शुद्धात्मतत्त्वमें इन धर्मोंको नहीं लगाता, अर्थात् इनको अपने नहीं
समझता है
।।८६।।
பேதபாவநா கரே சே, தேவீ பேதபாவநா க்ரமே கரீநே ஸாத காதாஸூத்ரோதீ கஹே சே :
பாவார்த:க்ருஷ்ண, கௌராதி தர்மோ வ்யவஹாரநயதீ ஜீவநீ ஸாதே ஸஂபத்த சே தோபண ஜே ஶுத்த
நிஶ்சயநயதீ ஶுத்த ஆத்மாதீ பிந்ந சே, கர்மஜநித சே, ஹேய சே, தேமநே வீதராக ஸ்வஸஂவேதநஜ்ஞாநீ
ஸ்வஶுத்தாத்மதத்த்வமாஂ யோஜதோ நதீ அநே ஸஂபத்த கரதோ நதீ. ஏ பாவார்த சே. ௮௬.