Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Telugu transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
శ్రీ దిగంబర జైన స్వాధ్యాయమందిర ట్రస్ట, సోనగఢ - ౩౬౪౨౫౦
అధికార-౧ : దోహా-౬౩ ]పరమాత్మప్రకాశ: [ ౧౧౩
-अशुभ संकल्प-विकल्पसे रहित आत्मासे विपरीत अनेक संकल्प-विकल्पसमूहरूप जो मन
और शुद्धात्मतत्त्वकी अनुभूतिसे भिन्न जो राग, द्वेष, मोहादिरूप सब विभाव ये सब आत्मासे
जुदे हैं, तथा वीतराग परमानन्दसुखरूप अमृतसे पराङ्मुख जो समस्त चतुर्गतिके महान
दुःखदायी दुःख वे सब जीवपदार्थसे भिन्न हैं
ये सभी अशुद्धनिश्चयनयकर आत्म-ज्ञानके
अभावसे उपार्जन किये हुए कर्मोंसे जीवके उत्पन्न हुए हैं इसलिये ये सब अपने नहीं हैं,
कर्मजनित हैं यहाँ पर परमात्म-द्रव्यसे विपरीत जो पाँचों इन्द्रियोंको आदि लेकर सब
विकल्प-जाल हैं, वे तो त्यागने योग्य हैं, उससे विपरीत पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंकी
अभिलाषाको आदि लेकर सब विकल्प-जालोंसे रहित अपना शुद्धात्मतत्त्व वही परमसमाधिके
समय साक्षात् उपादेय है
यह तात्पर्य जानना ।।६३।।
आगे संसारके सब सुख-दुःख शुद्ध निश्चयनयसे शुभ-अशुभ कर्मोंकर उत्पन्न होते हैं,
और कर्मोंको ही उपजाते हैं, जीवके नहीं है, ऐसा कहते हैं
వికల్పథీ రహిత ఆత్మాథీ విపరీత అనేక సంకల్ప వికల్పనీ జాళరూప జే మన అనే శుద్ధ ఆత్మానీ
అనుభూతిథీ విలక్షణ జే సమస్త విభావపర్యాయో అనే జే వీతరాగ పరమానందరూప సుఖామృతథీ ప్రతికూళ
చారగతినా సమస్త సంతాపో
దుఃఖనా దాహో ఏ సర్వ అశుద్ధ నిశ్చయనయథీ స్వసంవేదననా అభావథీ
ఉపార్జేలా కర్మథీ జీవోనే ఉత్పన్న థయాం ఛే.
అహీం, పరమాత్మద్రవ్యథీ ప్రతికూళ జే పంచేన్ద్రియాది సమస్త వికల్పజాళ ఛే తే హేయ ఛే, తేనాథీ
విపరీత పంచేన్ద్రియ విషయనీ అభిలాషాది సమస్త వికల్పథీ రహిత ఏవుం స్వశుద్ధాత్మతత్త్వ పరమ
సమాధినా సమయే సాక్షాత్ ఉపాదేయ ఛే, ఏవో భావార్థ ఛే. ౬౩.
హవే, శుద్ధ నిశ్చయనయథీ జీవోనా సాంసారిక సమస్త సుఖ-దుఃఖోనే కర్మ ఉత్పన్న కరే ఛే. ఏమ
కహే ఛే :
जनिता हे जीव, न केवलमेते अन्यदपि पुनरपि चतुर्गतिसंतापास्ते कर्मजनिता इति तद्यथा
अतीन्द्रियात् शुद्धात्मनो यानि विपरीतानि पञ्चेन्द्रियाणि, शुभाशुभसंकल्पविकल्परहितात्मनो यद्
विपरीतमनेकसंकल्पविकल्पजालरूपं मनः, ये च शुद्धात्मतत्त्वानुभूतेर्विलक्षणाः समस्तविभाव-
पर्यायाः, वीतरागपरमानन्दसुखामृतप्रतिकूलाः समस्तचतुर्गतिसंतापाः दुःखदाहाश्चेति सर्वेऽप्येते
अशुद्धनिश्चयनयेन स्वसंवेद्याभावोपार्जितेन कर्मणा निर्मिता जीवानामिति
अत्र परमात्म-
द्रव्यात्प्रतिकूलं यत्पञ्चेन्द्रियादिसमस्तविकल्पजालं तद्धेयं तद्विपरीतं स्वशुद्धात्मतत्त्वं पञ्चेन्द्रिय-
विषयाभिलाषादिसमस्तविकल्परहितं परमसमाधिकाले साक्षादुपादेयमिति भावार्थः
।।६३।।
अथ सांसारिकसमस्तसुखदुःखानि शुद्धनिश्चयनयेन जीवानां कर्म जनयतीति
निरूपयति