Parmatma Prakash (Gujarati Hindi) (Telugu transliteration).

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Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
శ్రీ దిగంబర జైన స్వాధ్యాయమందిర ట్రస్ట, సోనగఢ - ౩౬౪౨౫౦
౧౧౮ ]యోగీన్దుదేవవిరచిత: [ అధికార-౧ : దోహా-౬౬
भावार्थ :यह आत्मा शुद्ध निश्चयनयसे अनंतवीर्य (बल) का धारण करनेवाला होनेसे
शुभ-अशुभ कर्मरूप बंधनसे रहित है, तो भी व्यवहारनयसे इस अनादि संसारमें निज शुद्धात्माकी
भावनासे विमुख जो मन, वचन, काय इन तीनोंसे उपार्जे कर्मोंकर उत्पन्न हुए पुण्य-पापरूप
बँधनोंकर अच्छी तरह बँधा हुआ पंगुके समान आप ही न कहीं जाता है, न कहीं आता है
जैसे
बंदीवान आपसे न कहीं जाता है और न कहीं आता है, चौकीदारोंकर ले जाया जाता है, और
आता है, आप तो पंगुके समान है
वही आत्मा परमात्माकी प्राप्तिके रोकनेवाले चतुर्गतिरूप
संसारके कारणस्वरूप कर्मोंकर तीन जगत्में गमन-आगमन करता है, एक गतिसे दूसरी गतिमें
जाता है
यहाँ सारांश यह हैं, कि वीतराग परम आनंदरूप तथा सब तरह उपादेयरूप परमात्मासे
(अपने स्वरूपसे) भिन्न जो शुभ-अशुभ कर्म हैं, वे त्यागने योग्य हैं ।।६६।।
इसप्रकार कर्मकी शक्तिके स्वरूपके कहनेकी मुख्यतासे आठवें स्थलमें आठ दोहे
భావార్థ :ఆ ఆత్మా శుద్ధనిశ్చయనయథీ అనంతవీర్యవాళో హోవాథీ శుభాశుభకర్మరూప
బంధనద్వయథీ రహిత హోవా ఛతాం వ్యవహారనయథీ అనాది సంసారమాం స్వశుద్ధాత్మానీ భావనానా
ప్రతిబంధక మన, వచన, కాయ ఏ త్రణథీ ఉపార్జిత కరేలా కర్మథీ రచాయేల పుణ్య
పాపరూప బంధనద్వయథీ
ద్రఢతర బంధాయేలో థకో పాంగళా జేవో థఈనే స్వయం జతో నథీ అనే ఆవతో నథీ, పణ తే ఆత్మానే
పరమాత్మానీ ప్రాప్తినీ ప్రతిపక్షభూత విధిథీ, శబ్దథీ కహేవాతా కర్మథీ త్రణ లోకమాం లఈ జవాయ ఛే
అనే లావవామాం ఆవే ఛే.
అహీం, వీతరాగ సదానంద జేనుం ఏక రూప ఛే ఏవో సర్వ ప్రకారే ఉపాదేయభూత పరమాత్మాథీ
జే శుభాశుభ కర్మద్వయ భిన్న ఛే తే హేయ ఛే, ఏవో భావార్థ ఛే. ౬౬.
ఏ ప్రమాణే కర్మశక్తినా స్వరూపనా కథననీ ముఖ్యతాథీ ఆఠమా స్థళమాం ఆఠ దోహకసూత్రో
సమాప్త థయాం.
अयमात्मा न याति न चागच्छति क्व भुवणत्तयहं वि मज्झि जिय विहि आणइ विहि
णेइ भुवनत्रयस्यापि मध्ये हे जीव विधिरानयति विधिर्नयतीति तद्यथा अयमात्मा
शुद्धनिश्चयेनानन्तवीर्यत्वात् शुभाशुभकर्मरूपनिगलद्वयरहितोऽपि व्यवहारेण अनादिसंसारे
स्वशुद्धात्मभावनाप्रतिबन्धकेन मनोवचनकायत्रयेणोपार्जितेन कर्मणा निर्मितेन पुण्यपाप-
निगलद्वयेन
द्रढतरं बद्धः सन् पङ्गुवद्भूत्वा स्वयं न याति न चागच्छति स एवात्मा
परमात्मोपलम्भप्रतिपक्षभूतेन विधिशब्दवाच्येन कर्मणा भुवनत्रये नीयते तथैवानीयते चेति अत्र
वीतरागसदानन्दैकरूपात्सर्वप्रकारोपादेयभूतात्परमात्मनो यद्भिन्नं शुभाशुभकर्मद्वयं तद्धेयमिति
भावार्थः
।।६६।। इति कर्मशक्ति स्वरूपकथनमुख्यत्वेनाष्टमस्थस्ले सूत्राष्टकं गतम्
౧. పాఠాన్తర :अयमात्मा = स्वयमात्मा