क्वचिदपि च न विद्मो याति निक्षेपचक्रम्।
किमपरमभिदध्मो धाम्नि
__________________________________________________________________ थया पछी प्रमाणादिनुं आलंबन रहेतुं नथी. त्यार पछी त्रीजी साक्षात् सिद्ध अवस्था छे त्यां पण कांई आलंबन नथी. ए रीते सिद्ध अवस्थामां प्रमाण-नय-निक्षेपोनो अभाव ज छे.
ए अर्थनो कलशरूप श्लोक कहे छेः-
श्लोकार्थः– आचार्य शुद्धनयनो अनुभव करी कहे छे के -[अस्मिन् सर्वङ्कषे धाम्नि अनुभवम् उपयाते] आ सर्व भेदोने गौण करनार जे शुद्धनयनो विषयभूत चैतन्य-चमत्कारमात्र तेजःपुंज आत्मा, तेनो अनुभव थतां [नयश्रीः न उदयति] नयोनी लक्ष्मी उदय पामती नथी, [प्रमाणं अस्तम् एति] प्रमाण अस्तने प्राप्त थाय छे [अपि च] अने [निक्षेपचक्रम् क्वचित याति, न विद्मः] निक्षेपोनो समूह क्यां जतो रहे छे ते अमे जाणता नथी. [किम् अपरम् अभिदध्मः] आथी अधिक शुं कहीए? [द्वैतम् एव न भाति] द्वैत ज प्रतिभासित थतुं नथी.
भावार्थः– भेदने अत्यंत गौण करीेने कह्युं छे के -प्रमाण, नयादि भेदनी तो वात ज शी? शुद्ध अनुभव थतां द्वैत ज भासतुं नथी, एकाकार चिन्मात्र ज देखाय छे.
अहीं विज्ञानद्वैतवादी तथा वेदांती कहे छे के- छेवट परमार्थरूप तो अद्वैतनो ज अनुभव थयो. ए ज अमारो मत छे; तमे विशेष शुं कह्युं? एनो उत्तरः- तमारा मतमां सर्वथा अद्वैत मानवामां आवे छे. जो सर्वथा अद्वैत मानवामां आवे तो बाह्य वस्तुनो अभाव ज थई जाय, अने एवो अभाव तो प्रत्यक्ष विरुद्ध छे. अमारा मतमां नयविवक्षा छे ते बाह्य वस्तुनो लोप करती नथी. ज्यारे शुद्ध अनुभवथी विकल्प मटी जाय छे त्यारे आत्मा परमानंदने पामे छे तेथी अनुभव कराववा माटे “शुद्ध अनुभवमां द्वैत भासतुं नथी” एम कह्युं छे. जो बाह्य वस्तुनो लोप करवामां आवे तो आत्मानो पण लोप थई जाय अने शून्यवादनो प्रसंग आवे. माटे तमे कहो छो ते प्रमाणे वस्तुस्वरूपनी सिद्धि थई शकती नथी, अने वस्तुस्वरूपनी यथार्थ श्रद्धा विना जे शुद्ध अनुभव