समयसार गाथा-२०४ ] [ १८प अद्भुत वारसो मूकी गया छे. भाई! तेनो महिमा लावी स्वहित माटे स्वाध्याय करवो जोईए.
कहे छे-‘आत्मानो लाभ थाय छे, अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे.’ अहाहाहा...! एक शुद्धना अवलंबने शुद्धतानी प्राप्ति थाय छे अने अशुद्धतानो परिहार थाय छे. अर्थात् अशुद्धतानो परिहार ते व्यय अने शुद्धतानी प्राप्ति ते उत्पाद छे अने आलंबनयोग्य जे एक शुद्ध त्रिकाळ वस्तु ते ध्रुव छे. अहा! आवां उत्पाद-व्यय-ध्रुव! भाई! आ तो धीरानुं काम बापा! आ कांई पुण्यनी क्रिया करतां करतां मळी जाय एम नथी. अज्ञानीने एम थाय छे के आमां व्यवहार तो न आव्यो? भाई! निश्चय प्रगटे तेने व्यवहार होय छे. निश्चय विनानो व्यवहार व्यवहार ज नथी, ए तो व्यवहाराभास छे.
भगवान! तुं चैतन्यनिधान छो. तारामां अनंती स्वरूपसंपदा भरेली छे. ‘भगवान्’-एम कळश १४१ मां आवे छे ने? भग नाम लक्ष्मी अने वान् एटले वाळो. अहाहा...! अनंत अनंत ज्ञान अने आनंदनी लक्ष्मीथी भरेलो तुं भगवान छो. परम अध्यात्मतरंगिणीमां भगं–लक्ष्मी विद्यते यस्य सः भगवान्–एम भगवाननो अर्थ कर्या छे. ‘भग’ नाम श्री, ज्ञान, वीर्य, प्रयत्न, कीर्ति, माहात्म्य -एवा अर्थ पण थाय छे. पण अहीं ‘भग’नो अर्थ लक्ष्मी-ज्ञान अने आनंदनी लक्ष्मी कर्यो छे केमके आत्मा ज्ञान अने आनंद जेनुं स्वरूप छे एवी स्वरूपलक्ष्मीनो अखूट भंडार छे. केवळज्ञानादि पर्यायो अनंती प्रगटे तोय अनंतकाळे न खूटे एवुं अखूट निधान छे. अहाहा...! जेनो स्वभाव ज ज्ञान छे तेनी वात शुं? आवा भगवान आत्मानुं आलंबन लेतां भ्रान्तिनो नाश थई आत्मलाभ थाय छे. जो खेतरमां दटायेलो चरु नीकळे तो तेमां क्रोडो मणि-रत्न भाळीने ‘ओहोहोहो...’ एम थई जाय छे. पण अहीं आत्मामां क्रोडो तो शुं अनंत-अनंत-अनंत क्रोडो रतन भर्यां छे. भाई! तुं एमां अंतर्द्रष्टि कर, तने भगवानना भेटा थशे, अतीन्द्रिय आनंद प्रगटशे अने अशुद्धतानो परिहार थशे.
आम थवाथी कहे छे के-‘कर्म जोरावर थई शकतुं नथी.’ कर्म तरफनुं वशपणुं हतुं तेने कर्मनुं जोरावरपणुं कहेवाय छे. कर्मने वश पोते थई परिणमे त्यारे कर्म जोरावर छे एम कहेवामां आवे छे. हवे ज्यां वस्तुस्वभावने वश थई परिणम्यो त्यां निमित्तने वशे जे जोर हतुं ते जोर नीकळी जाय छे. हवे ते परने वश न थतां स्वने वश थाय छे. ‘कर्म जोरावर थई शकतुं नथी’-ए कहेवानुं तात्पर्य ए छे के स्ववशे अशुद्धता ज्यारे नीकळी जाय छे त्यारे अशुद्धतानुं जोर जे निमित्तने वशे हतुं ते रहेतुं नथी.