Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२२ [ समयसार प्रवचन

(मालिनी)
न हि
विदधति बद्धस्पृष्टभावादयोऽमी
स्फुटमुपरि तरन्तोऽप्येत्य यत्र प्रतिष्ठाम्।

__________________________________________________________________ तेमनो सर्वथा एकांत पक्ष आवी जशे अने तेथी मिथ्यात्व आवी जशे, ए रीते ए शुद्धनयनुं आलंबन पण वेदांतीओनी जेम मिथ्याद्रष्टिपणुं लावशे. माटे सर्व नयोना कथंचित् रीते सत्यार्थपणानुं श्रद्धान करवाथी ज सम्यग्द्रष्टि थई शकाय छे. आ रीते स्याद्वादने समजी जिनमतनुं सेवन करवुं, मुख्य-गौण कथन सांभळी सर्वथा एकांत पक्ष न पकडवो. आ गाथासूत्रनुं व्याख्यान करतां टीकाकार आचार्ये पण कह्युं छे के आत्मा व्यवहारनयनी द्रष्टिमां जे बद्धस्पृष्ट आदि रूपे देखाय छे ते ए द्रष्टिमां तो सत्यार्थ ज छे परंतु शुद्धनयनी द्रष्टिमां बद्धस्पृष्टादिपणुं असत्यार्थ छे. आ कथनमां टीकाकार आचार्ये स्याद्वाद बताव्यो छे एम जाणवुं.

वळी, अहीं एम जाणवुं के आ नय छे ते श्रुतज्ञान-प्रमाणनो अंश छे; श्रुतज्ञान वस्तुने परोक्ष जणावे छे; तेथी आ नय पण परोक्ष ज जणावे छे. शुद्धद्रव्यार्थिकनयनो विषयभूत, बद्धस्पृष्ट आदि पांच भावोथी रहित आत्मा चैतन्यशक्तिमात्र छे. ते शक्ति तो आत्मामां परोक्ष छे ज. वळी तेनी व्यक्ति कर्मसंयोगथी मति-श्रुतादि ज्ञानरूप छे ते कंथचित् अनुभवगोचर होवाथी प्रत्यक्षरूप पण कहेवाय छे, अने संपूर्णज्ञान जे केवळज्ञान ते जोके छद्मस्थने प्रत्यक्ष नथी तोपण आ शुद्धनय आत्माना केवळज्ञानरूपने परोक्ष जणावे छे. ज्यां सुधी आ नयने जीव जाणे नहि त्यां सुधी आत्माना पूर्ण रूपनुं ज्ञान-श्रद्धान थतुं नथी. तेथी श्री गुरुए आ शुद्धनयने प्रगट करी उपदेश कर्यो के बद्धस्पृष्ट आदि पांच भावोथी रहित पूर्णज्ञानघनस्वभाव आत्माने जाणी श्रद्धान करवुं, पर्यायबुद्धि न रहेवुं. अहीं कोई एवो प्रश्न करे के-एवो आत्मा प्रत्यक्ष तो देखातो नथी अने विना देख्ये श्रद्धान करवुं ते जूठुं श्रद्धान छे. तेनो उत्तरः-देखेलानुं ज श्रद्धान करवुं ए तो नास्तिक मत छे. जिनमतमां तो प्रत्यक्ष अने परोक्ष-बन्ने प्रमाण मानवामां आव्यां छे. तेमां आगमप्रमाण परोक्ष छे. तेनो भेद शुद्धनय छे. आ शुद्धनयनी द्रष्टिथी शुद्ध आत्मानुं श्रद्धान करवुं, केवळ व्यवहार-प्रत्यक्षनो ज एकांत न करवो. अहीं, आ शुद्धनयने मुख्य करी कलशरूप काव्य कहे छेः- श्लोकार्थः– [जगत् तम् एव सम्यक्स्वभावम् अनुभवतु] जगतना प्राणीओ ए सम्यक् स्वभावनो अनुभव करो के [यत्र] ज्यां [अमी बद्धस्पृष्टभावादयः] बद्धस्पृष्ट