गाथा १७-१८] [ ४प मार्ग तो आ छे. भाई! पण संप्रदायवाळाने लागे के आ ते वळी कई जातनो मार्ग? नवो काढयो हशे? अरे भाई! तने खबर नथी, बापु! आत्मा तो सर्वज्ञस्वभावी छे ज, पण कोने? जेणे अंतर्मुख थई एमां एकाग्रता करी प्रतीतिमां लीधो एने. आत्मा सर्वज्ञस्वभावी छे एनी सत्तानो स्वीकार कोणे कर्यो? ए पर्याय ए तरफ ढळीने आ छे एम ज्यारे जाण्युं त्यारे ते श्रद्धामां आव्यो. त्यारे एणे ज्ञाननी-आत्मानी सेवा करी एम यथार्थ कहेवाय.
जोके आत्मा ज्ञान साथे तद्रूपे छे तोपण ते एक क्षणमात्र ज्ञानने सेवतो नथी, केमके पुण्य-पाप, दया, दान, आदि जे विकल्प ते आत्मा एम एनी द्रष्टि पर्यायमां पडी छे. ज्ञाननी पर्याये गुलांट खाईने आ ‘ज्ञान ते आत्मा’ एम एणे कदी अनुभव कर्यो ज नथी. बीजा लोको आवी वातो सांभळीने राडो पाडे छे हों. बिचारा! (कायर छे तेथी कंपी ऊठे छे) एकान्त छे, एकान्त छे एम शोर करे छे. पण भाई, ए सम्यक् एकान्त छे, त्रिकाळी ज्ञायकस्वभाव आ छे एम ए पर्याये जाण्युं त्यारे सम्यक् एकान्त थयुं. (सम्यक् एकान्त एवा निजपदनी प्राप्ति थई.) भाई! निजघरमां शुद्धचैतन्यघनमां जुए नहीं अने बहारथी राडो पाडे; पण एम कांई चाले?
पोते वीतरागस्वरूप भगवान आत्मा छे. आ वीतरागनी आज्ञा छे. कळशटीकामां आवे छे ने के ‘जिनवचमि रमन्ते’ एटले जिनवचननो कहेवानो भाव वीतरागता छे. जिनवचननुं तात्पर्य वीतरागता छे. पंचास्तिकाय गाथा १७२ मां सूत्रतात्पर्य अने शास्त्रतात्पर्य एम बे वात लीधी छे. सूत्रतात्पर्य सूत्र प्रमाणे छे अने शास्त्रतात्पर्य वीतरागता छे एम लीधुं छे. चारेय अनुयोगोनुं तात्पर्य वीतरागता बताव्युं छे. हवे वीतरागता कयारे प्रगटे? स्वनो आश्रय लईने परनो आश्रय छोडे त्यारे. जिनवचनमां शुद्धद्रव्यार्थिकनये एक शुद्धात्माने उपादेय कह्यो छे. एनो अर्थ ए के वीतरागभाव केम प्रगट थाय एनो उपदेश आप्यो छे. परनी अपेक्षा छोडी एक शुद्ध जीववस्तुरूप स्वमां जाय त्यारे वीतरागता थाय. समजाणुं कांई? आ तो परमात्मानो गहन मार्ग, भाई! अंदरथी उकेल कर्या विना बहारथी वादविवाद करे के आम छे ने तेम छे एमां कांई वळे नहि.
हवे केम सेवतो नथी एनुं कारण आपतां कहे छे केः-‘कारण के स्वयंबुद्धत्व (पोते पोतानी मेळे जाणवुं ते) अथवा बोधितबुद्धत्व (बीजाना जणाववाथी जाणवुं ते)-ए कारणपूर्वक ज्ञाननी उत्पत्ति थाय छे.’ स्वयंबुद्धत्व एटले हुं शुद्ध ज्ञानघन चैतन्यस्वरूपी आत्मा छुं एम स्वयं पोतानी मेळे स्व तरफ झूकाव थतां जाणे ते. अने बोधितबुद्धत्व एटले बीजा कोई धर्मात्मा ज्ञानीना जणाववाथी जाणे ते. समक्ति बे प्रकारे थाय छे एम आवे छे ने? ‘निर्सगात् अधिगमात् वा’ धर्मात्मा ज्ञानी एने कहे के-भाई तारी पुंजी मोटी. शुद्ध आत्मतत्त्व ए तारी पुंजी-निधान छे; त्यां जो ने. जेमां तुं नथी त्यां तुं