Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-६८ ] [ २०१

तर्हि को जीव इति चेत्–
(अनुष्टुभ्)
अनाद्यनन्तमचलं स्वसंवेद्यमिदं स्फुटम्।
जीवः स्वयं तु चैतन्यमुच्चैश्चकचकायते।। ४१ ।।

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माटे रागादि भावो जीव नथी एम सिद्ध थयुं.

भावार्थः– शुद्धद्रव्यार्थिक नयनी द्रष्टिमां चैतन्य अभेद छे अने एना परिणाम पण स्वाभाविक शुद्ध ज्ञान-दर्शन छे. परनिमित्तथी थता चैतन्यना विकारो, जोके चैतन्य जेवा देखाय छे तोपण, चैतन्यनी सर्व अवस्थाओमां व्यापक नहि होवाथी चैतन्यशून्य छे-जड छे. वळी आगममां पण तेमने अचेतन कह्या छे. भेदज्ञानीओ पण तेमने चैतन्यथी भिन्नपणे अनुभवे छे तेथी पण तेओ अचेतन छे, चेनत नथी.

प्रश्नः– जो तेओ चेतन नथी तो तेओ कोण छे? पुद्गल छे? के अन्य कांई छे?

उत्तरः– पुद्गलकर्मपूर्वक थतां होवाथी तेओ निश्चयथी पुद्गल ज छे केम के कारण जेवुं ज कार्य थाय छे.

आ रीते एम सिद्ध कर्युं के पुद्गलकर्मना उदयना निमित्तथी थता चैतन्यना विकारो पण जीव नथी, पुद्गल छे.

हवे पूछे छे के वर्णादिक अने रागादिक जीव नथी तो जीव कोण छे? तेना उत्तररूप श्लोक कहे छेः-

श्लोकार्थः– [अनादि] जे अनादि छे अर्थात् कोई काळे उत्पन्न थयुं नथी, [अनन्तम्] जे अनंत छे अर्थात् कोई काळे जेनो विनाश नथी, [अचलं] जे अचळ छे अर्थात् जे कदी चैतन्यपणाथी अन्यरूप-चळाचळ-थतुं नथी, [स्वसंवेद्यम्] जे स्वसंवेद्य छे अर्थात् जे पोते पोताथी ज जणाय छे [तु] अने [स्फुटम्] जे प्रगट छे अर्थात् छूपुं नथी-एवुं जे [इदं चैतन्यम्] आ चैतन्य [उच्चैः] अत्यंतपणे [चकचकायते] चकचकाट प्रकाशी रह्युं छे, [स्वयं जीवः] ते पोते ज जीव छे.

भावार्थः– वर्णादि अने रागादि भावो जीव नथी पण उपर कह्यो तेवो चैतन्यभाव ते ज जीव छे. ४१.

हवे, चेतनपणुं ज जीवनुं योग्य लक्षण छे एम काव्य द्वारा समजावे छेः-