Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२०६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-३ ए विकारी भाव निमित्तने लक्षे थयेलो छे अने जीवद्रव्यना स्वभावमां नथी तेथी तेने पुद्गलनुं कार्य गणीने जीवमांथी काढी नाखवो छे.

प्रवचनसारनी गाथा १८९मां एम आवे छे के शुद्धनयथी आत्मा विकारनो र्क्ता स्वतः छे. परने लईने के कर्मना उदयने लईने विकार थतो नथी एम त्यां कह्युं छे. पंचास्तिकायनी गाथा ६२मां पण कह्युं छे के आत्मानी विकारी पर्यायनुं परिणमन पोताना षट्कारकथी स्वतः छे अने ते अन्य कारकोथी निरपेक्ष छे. एटले के जीवनी पर्यायमां जे विकारनुं परिणमन थाय छे एने कर्मना उदयनी अपेक्षा नथी एम त्यां सिद्ध कर्युं छे. परंतु अहीं अपेक्षा जुदी छे. अहीं तो कहे छे के पर्यायमां जे विकार थाय छे ते द्रव्यस्वभावमां नथी. विकार द्रव्यनी चीज नथी. एटला माटे पर्यायना विकारने अने कर्मने बन्नेने एक गणीने विकार कर्मप्रकृतिना उदयपूर्वक थाय छे एम कह्युं छे. प्रकृति जड अचेतन छे तेथी विकार पण सदाय अचेतन छे एम कह्युं छे.

कर्मनो उदय आवे तेम डीग्री टु डीग्री विकार करवो पडे ए तो बे द्रव्योनी एक्तानी वात छे तेथी तद्न मिथ्या छे. श्री जयसेनाचार्यनी प्रवचनसार गाथा ४पनी टीकामां तो आवे छे के द्रव्यमोहकर्मनो उदय होवा छतां, जीव जो पोते शुद्धपणे परिणमे तो, उदय खरी जाय छे. कर्मनो उदय आवे छे माटे जीवने विकार करवो पडे छे एम बिलकुल नथी. पोताना वर्तमान पुरुषार्थनी जेटली योग्यता होय तेटलो विकारपणे परिणमे छे. कर्मनो उदय होय छतां उदयपणे न परिणमे ए पोतानी-जीवनी परिणतिनी स्वतंत्रता छे. अहीं बीजी अपेक्षाए वात छे. के पोतानी परिणतिमां जे विकार-अशुद्धता थाय छे ते कर्मने आधीन-वश थईने थाय छे तेथी कर्मने कारणे थाय छे एम कह्युं छे.

गाथा ६प-६६मां पर्याप्त, अपर्याप्त, बादर, सूक्ष्म आदि भेदो नामप्रकृतिथी थया छे एम लीधुं हतुं. अहीं मिथ्यात्वादि चौदेय गुणस्थानो मोहकर्मनी प्रकृतिना उदयथी थया छे एम कहे छे. जयसेनाचार्यनी टीकामां ‘मोहजोग भवा’ एवुं श्री गोम्मटसारनुं वचन उद्धत करी दर्शाव्युं छे के मोह अने योगना निमित्तथी आ बधा गुणस्थानना भेद पडे छे.

कहे छे के आ मिथ्यात्वादि गुणस्थानो-पहेलाथी मांडीने चौदमा गुणस्थान सुधीना- बधाय पौद्गलिक मोहकर्मनी प्रकृतिना उदयपूर्वक थाय छे अने तेथी तेओ सदाय अचेतन छे. संस्कृत टीकामां ‘विपाक’ शब्द लीधो छे, ज्यारे गुजरातीमां ‘उदय’ शब्द छे. जे जड मोहकर्म छे एना उदय नाम विपाककाळे विपाकपूर्वक आ चौद गुणस्थान थाय छे. तेवी रीते विशुद्धिनां स्थान-रागनी मंदतानां स्थान अर्थात् असंख्य प्रकारना प्रशस्त शुभरागना भाव पण मोहकर्मनी प्रकृतिना विपाकपूर्वक थाय छे अने तेथी ते अचेतन