२] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
अण्णाणी ताव दु सो
जीवस्यैवं बन्धो भणितः खलु सर्वदर्शिभिः।। ७०।।
________________________________________________________________________ [एकः कर्ता] एक कर्ता छुं अने [अमी कोपादयः] आ क्रोधादि भावो [मे कर्म] मारां कर्म छे’ [इति अज्ञानां कर्तृकर्मप्रवृत्तिम्] एवी अज्ञानीओने जे कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे तेने [अभितः शमयत्] बधी तरफथी शमावती (-मटाडती) [ज्ञानज्योतिः] ज्ञानज्योति [स्फुरति] स्फुरायमान थाय छे. केवी छे ते ज्ञानज्योति? [परम–उदात्तम्] जे परम उदात्त छे अर्थात् कोईने आधीन नथी, [अत्यन्तधीरं] जे अत्यंत धीर छे अर्थात् कोई प्रकारे आकुळतारूप नथी अने [निरुपधि–पृथग्द्रव्य–निर्भासि] परनी सहाय विना जुदां जुदां द्रव्योने प्रकाशवानो जेनो स्वभाव होवाथी [विश्वम् साक्षात् कुर्वत्] जे समस्त लोकालोकने साक्षात् करे छे-प्रत्यक्ष जाणे छे.
अज्ञानने दूर करीने, पोते प्रगट प्रकाशमान थाय छे. ४६.
हवे, ज्यां सुधी आ जीव आस्रवना अने आत्माना विशेषने (तफावतने) जाणे नहि त्यां सुधी ते अज्ञानी रह्यो थको, आस्रवोमां पोते लीन थतो, कर्मोनो बंध करे छे एम गाथामां कहे छेः-
क्रोधादिमां स्थिति त्यां लगी अज्ञानी एवा जीवनी. ६९.
सहु सर्वदर्शी ए रीते बंधन कहे छे जीवने. ७०.
गाथार्थः– [जीवः] जीव [यावत्] जयां सुधी [आत्मास्रवयोः द्वयोः अपि तु] आत्मा अने आस्रव-ए बन्नेना [विशेषान्तरं] तफावत अने भेदने [न वेत्ति] जाणतो