२०६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
हवे आ व्यवहारने दूषण दे छे.
‘प्रथम तो, जगतमां जे क्रिया छे ते बधीय परिणामस्वरूप होवाथी खरेखर परिणामथी भिन्न नथी (-परिणाम ज छे)’
अहीं क्रिया एम केम कह्युं? परिणाम न कहेतां क्रिया कहेवानो आशय एम छे के वस्तुमां सहजपणे पलटती अवस्था-परिणाम होय छे; ते पलटती अवस्था-पर्यायने क्रिया कहेवामां आवे छे. कह्युं छे ने के-
प्रश्नः– पलटती अवस्थामां एक मटीने बीजी अवस्था थई त्यां निमित्त छे तो बीजी अवस्था थईने?
उत्तरः– ना, एम नथी. क्रिया कहेतां परिणामनुं पलटवुं वस्तुनुं स्वरूप छे. एक अवस्था बदलीने बीजी थाय छे त्यां लोकोने भ्रमथी एम लागे छे के निमित्त आव्युं माटे अवस्था बदलीने बीजी अवस्था थई छे; परंतु एम छे ज नहि. अहीं कह्युं ने के -प्रथम तो जगतमां जे क्रिया छे ते परिणामस्वरूप छे अने ते परिणाम ज छे. जड अने चेतननी पलटती अवस्थारूप जे क्रिया छे ते बधी परिणामस्वरूप छे.
भाई! आ तो तत्त्वज्ञाननी मूळ प्रयोजनभूत वात छे. बीजी वातने जाणो के न जाणो, पण आ प्रयोजनभूत तत्त्वनी वात तो अवश्य जाणवी जोईए. कहे छे के -जे क्रिया छे ते परिणामस्वरूप छे अने ते परिणाम ज छे. पलटती क्रिया ते द्रव्यनुं कर्म एटले कार्य छे. परिणाम कहो, कर्म कहो, कार्य कहो के व्याप्य कहो- ए बधुं एक ज छे. वास्तवमां परिणामस्वरूप क्रिया परिणामथी भिन्न नथी. आ शरीरना हालवाचालवानी बदलती अवस्थारूप जे क्रिया थई ते शुं आत्माए विकल्प कर्यो माटे त्यां शरीरमां क्रिया थई? तो कहे छे के ना, एम नथी. ए पलटवारूप क्रिया पोताना (द्रव्यना) परिणामस्वरूप छे. अहाहा...! आ आंगळीनी हलवानी जे क्रिया थई ते क्रिया पोताना परिणामस्वरूप छे. अहीं क्रिया अने परिणाम भिन्न नथी एम बताव्युं छे.
वळी, ‘परिणाम पण परिणामीथी (द्रव्यथी) भिन्न नथी कारण के परिणाम अने परिणामी अभिन्न वस्तु छे.’ जुओ, जड अने चेतनमां जे क्रिया छे ते बधीय परिणामस्वरूप छे अने ते परिणामथी भिन्न नथी; अने ते परिणाम परिणामीथी भिन्न नथी, परिणामी ज छे.