Samadhitantra-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 72.

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१२६समाधितंत्र

जनेभ्यो वाक् ततः स्पन्दो मनसश्चित्तविभ्रमाः
भवन्ति तस्मात्संसर्गा जनैर्योगी ततस्त्यजेत् ।।७२।।

टीकाजनेभ्यो वाक् वचनप्रवृत्तिर्भवति प्रवृत्तेः स्पन्दो मनसः व्यग्रता मानसे भवति तस्याऽऽत्मनः स्पन्दाच्चित्तविभ्रमाः नानाविकल्पपवृत्तयो भवन्ति यत एवं, तत्तस्मात् योगी त्यजेत् कं ? संसर्ग सम्बन्धम् कैः सह ? जनैः

श्लोक ७२

अन्वयार्थ :(जनेभ्यः) लोकोना संसर्गथी (वाक्) वचननी प्रवृत्ति थाय छे; (ततः) तेनाथी एटले वचनप्रवृत्तिथी (मनसः स्पन्दः) मननी व्यग्रता थाय छेचित्त चलायमान थाय छे, (तस्मात्) तेनाथी एटले चित्तनी चंचलताथी (चित्तविभ्रमाः भवन्ति) चित्तमां विविध प्रकारना विकल्पो ऊठवा लागे छे अर्थात् मन विक्षिप्त थई जाय छे; (ततः) तेथी (योगी) योगीएयोगमां संलग्न थवावाळा अन्तरात्माए(जनैः संसर्गं त्यजेत्) लौकिक जनोना संसर्गनो त्याग करवो.

टीका :लोको साथे बोलवाथी वचननी प्रवृत्ति थाय छे, प्रवृत्तिथी मननुं स्पंदन मनमां व्यग्रताथाय छे, ते आत्माना (भावमनना) स्पंदनथी चित्तविभ्रमो अर्थात् विविध प्रकारना विकल्पोनी प्रवृत्ति थाय छे; तेटला माटे योगीए तजवो. शुं (तजवो)? संसर्गसंबंध कोनी साथेनो? लोको साथेनो.

भावार्थ :लौकिक जनो साथे वार्तालाप करवाथी मन व्यग्र बने छे,चित्त चलायमान थाय छे अने विविध प्रकारना संकल्पविकल्पो ऊठे छे. तेनाथी आत्मस्वरूपमां स्थिरता रहेती नथी. माटे आत्मस्वरूपना अभ्यासीए लौकिक जनोना संसर्गथी दूर रहेवुं योग्य छे.

विशेष

साधकने जेम जेम भेदविज्ञाननुं बळ वधतुं जाय छे तेम तेम तेने पर पदार्थो प्रत्ये उपेक्षाभाव थाय छे अने वीतरागता वधती जाय छे. वीतरागताना प्रमाणमां ते आत्मस्थिरता प्राप्त करे छे. स्वरूपस्थिरताना काळे लौकिक जनो साथेनो संसर्ग स्वयं छूटी जाय छे. ७२.

जनसंगे वचसंग ने तेथी मननो स्पंद,
तेथी मन बहुविध भमे, योगी तजो जनसंग. ७२.