कहानजैनशास्त्रमाळा ]
चेतनाया दर्शनज्ञानविकल्पानतिक्रमणाच्चेतयितृत्वमिव द्रष्टृत्वं ज्ञातृत्वं चात्मनः स्वलक्षणमेव । ततोऽहं द्रष्टारमात्मानं गृह्णामि । यत्किल गृह्णामि तत्पश्याम्येव; पश्यन्नेव पश्यामि,
गाथार्थः — [प्रज्ञया] प्रज्ञा वडे [गृहीतव्यः] एम ग्रहण करवो के — [यः द्रष्टा] जे देखनारो छे [सः तु] ते [निश्चयतः] निश्चयथी [अहम्] हुं छुं, [अवशेषाः] बाकीना [ये भावाः] जे भावो छे [ते] ते [मम पराः] माराथी पर छे [इति ज्ञातव्याः] एम जाणवुं.
[प्रज्ञया] प्रज्ञा वडे [गृहीतव्यः] एम ग्रहण करवो के — [यः ज्ञाता] जे जाणनारो छे [सः तु] ते [निश्चयतः] निश्चयथी [अहम्] हुं छुं, [अवशेषाः] बाकीना [ये भावाः] जे भावो छे [ते] ते [मम पराः] माराथी पर छे [इति ज्ञातव्याः] एम जाणवुं.
टीकाः — चेतना दर्शनज्ञानरूप भेदोने उल्लंघती नहि होवाथी, चेतकपणानी माफक दर्शकपणुं अने ज्ञातापणुं आत्मानुं स्वलक्षण ज छे. माटे हुं देखनारा आत्माने ग्रहण करुं छुं. ‘ग्रहण करुं छुं’ एटले ‘देखुं ज छुं’; देखतो ज (अर्थात् देखतो थको ज) देखुं छुं, देखता