इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यायामात्मख्यातौ मोक्षप्ररूपकः अष्टमोऽङ्कः ।।
ज्यों नर कोय पर्यो द्रढबंधन बंधस्वरूप लखै दुखकारी,
चिंत करै निति कैम कटै यह तौऊ छिदै नहि नैक टिकारी;
छेदनकूं गहि आयुध धाय चलाय निशंक करै दुय धारी,
यों बुध बुद्धि धसाय दुधा करि कर्म रु आतम आप गहारी.
चिंत करै निति कैम कटै यह तौऊ छिदै नहि नैक टिकारी;
छेदनकूं गहि आयुध धाय चलाय निशंक करै दुय धारी,
यों बुध बुद्धि धसाय दुधा करि कर्म रु आतम आप गहारी.
आम श्री समयसारनी (श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत श्री समयसार परमागमनी) श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित आत्मख्याति नामनी टीकामां मोक्षनो प्ररूपक आठमो अंक समाप्त थयो.
४५४समयसार