कहानजैनशास्त्रमाळा ]
ये त्वात्मानं कर्तारमेव पश्यन्ति ते लोकोत्तरिका अपि न लौकिकतामतिवर्तन्ते; लौकिकानां परमात्मा विष्णुः सुरनारकादिकार्याणि करोति, तेषां तु स्वात्मा तानि करोतीत्यपसिद्धान्तस्य समत्वात् । ततस्तेषामात्मनो नित्यकर्तृत्वाभ्युपगमात् लौकिकानामिव लोकोत्तरिकाणामपि नास्ति मोक्षः ।
लोकना मतमां [विष्णुः] विष्णु [करोति] करे छे अने [श्रमणानाम् अपि] श्रमणोना मतमां पण [आत्मा] आत्मा [करोति] करे छे (तेथी कर्तापणानी मान्यतामां बन्ने समान थया). [एवं] ए रीते, [सदेवमनुजासुरान् लोकान्] देव, मनुष्य अने असुरवाळा त्रणे लोकने [नित्यं कुर्वतां] सदाय करता (अर्थात् त्रणे लोकना कर्ताभावे निरंतर प्रवर्तता) एवा [लोकश्रमणानां द्वयेषाम् अपि] ते लोक तेम ज श्रमण — बन्नेनो [कः अपि मोक्षः] कोई मोक्ष [न द्रश्यते] देखातो नथी.
टीकाः — जेओ आत्माने कर्ता ज देखे छे — माने छे, तेओ लोकोत्तर होय तोपण लौकिकताने अतिक्रमता नथी; कारण के, लौकिक जनोना मतमां परमात्मा विष्णु देवनारकादि कार्यो करे छे, अने तेमना ( – लोकथी बाह्य थयेला एवा मुनिओना) मतमां पोतानो आत्मा ते कार्यो करे छे — एम *अपसिद्धांतनी (बन्नेने) समानता छे. माटे आत्माना नित्य कर्तापणानी तेमनी मान्यताने लीधे, लौकिक जनोनी माफक, लोकोत्तर पुरुषोनो (मुनिओनो) पण मोक्ष थतो नथी.
भावार्थः — जेओ आत्माने कर्ता माने छे, तेओ भले मुनि थया होय तोपण लौकिक जन जेवा ज छे; कारण के, लोक इश्वरने कर्ता माने छे अने ते मुनिओए आत्माने कर्ता मान्यो — एम बन्नेनी मान्यता समान थई. माटे जेम लौकिक जनोने मोक्ष नथी, तेम ते मुनिओने पण मोक्ष नथी. जे कर्ता थशे ते कार्यना फळने भोगवशे ज, अने जे फळ भोगवशे तेने मोक्ष केवो?
हवे, ‘परद्रव्यने अने आत्माने कांई पण संबंध नथी, माटे कर्ताकर्मसंबंध पण नथी’ — एम श्लोकमां कहे छेः —
श्लोकार्थः — [परद्रव्य-आत्मतत्त्वयोः सर्वः अपि सम्बन्धः नास्ति] परद्रव्यने अने आत्मतत्त्वने सघळोय (अर्थात् कांई पण) संबंध नथी; [कर्तृ-कर्मत्व-सम्बन्ध-अभावे] एम कर्ताकर्मपणाना संबंधनो अभाव होतां, [तत्कर्तृता कुतः] आत्माने परद्रव्यनुं कर्तापणुं क्यांथी होय?
भावार्थः — परद्रव्यने अने आत्माने कांई पण संबंध नथी, तो पछी तेमने कर्ताकर्म-
* अपसिद्धांत = खोटो अथवा भूलभरेलो सिद्धांत