Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 209-210.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
४९५
(शार्दूलविक्रीडित)
कर्तृर्वेदयितुश्च युक्तिवशतो भेदोऽस्त्वभेदोऽपि वा
कर्ता वेदयिता च मा भवतु वा वस्त्वेव सञ्चिन्त्यताम्
प्रोता सूत्र इवात्मनीह निपुणैर्भेत्तुं न शक्या क्वचि-
च्चिच्चिन्तामणिमालिकेयमभितोऽप्येका चकास्त्वेव नः
।।२०९।।
(रथोद्धता)
व्यावहारिकद्रशैव केवलं
कर्तृ कर्म च विभिन्नमिष्यते
निश्चयेन यदि वस्तु चिन्त्यते
कर्तृ कर्म च सदैकमिष्यते
।।२१०।।

श्लोकार्थः[कर्तुः च वेदयितुः युक्तिवशतः भेदः अस्तु वा अभेदः अपि] कर्तानो अने भोक्तानो युक्तिना वशे भेद हो अथवा अभेद हो, [वा कर्ता च वेदयिता मा भवतु] अथवा कर्ता अने भोक्ता बन्ने न हो; [वस्तु एव सञ्चिन्त्यताम्] वस्तुने ज अनुभवो. [निपुणैः सूत्रे इव इह आत्मनि प्रोता चित्-चिन्तामणि-मालिका क्वचित् भेत्तुं न शक्या] जेम चतुर पुरुषोए दोरामां परोवेली मणिओनी माळा भेदी शकाती नथी, तेम आत्मामां परोवेली चैतन्यरूप चिंतामणिनी माळा पण कदी कोईथी भेदी शकाती नथी; [इयम् एका] एवी आ आत्मारूपी माळा एक ज, [नः अभितः अपि चकास्तु एव] अमने समस्तपणे प्रकाशमान हो (अर्थात् नित्यत्व, अनित्यत्व आदिना विकल्पो छूटी आत्मानो निर्विकल्प अनुभव अमने हो).

भावार्थःआत्मा वस्तु होवाथी द्रव्यपर्यायात्मक छे; तेथी तेमां चैतन्यना परिणमनरूप पर्यायना भेदोनी अपेक्षाए तो कर्ता-भोक्तानो भेद छे अने चिन्मात्र द्रव्यनी अपेक्षाए भेद नथी; एम भेद-अभेद हो. अथवा चिन्मात्र अनुभवनमां भेद-अभेद शा माटे कहेवो? (आत्माने) कर्ता-भोक्ता ज न कहेवो, वस्तुमात्र अनुभव करवो. जेम मणिओनी माळामां मणिओनी अने दोरानी विवक्षाथी भेद-अभेद छे परंतु माळामात्र ग्रहण करतां भेदाभेद-विकल्प नथी, तेम आत्मामां पर्यायोनी अने द्रव्यनी विवक्षाथी भेद-अभेद छे परंतु आत्मवस्तुमात्र अनुभव करतां विकल्प नथी. आचार्य महाराज कहे छे केएवो निर्विकल्प आत्मानो अनुभव अमने प्रकाशमान हो. २०९.

हवे आगळनी गाथाओनी सूचनारूप काव्य कहे छेः

श्लोकार्थः[केवलं व्यावहारिकद्रशा एव कर्तृ च कर्म विभिन्नम् इष्यते] केवळ व्यावहारिक द्रष्टिथी ज कर्ता अने कर्म भिन्न गणवामां आवे छे; [निश्चयेन यदि वस्तु चिन्त्यते] निश्चयथी