किञ्चनापि परिणामिनः स्वयम् ।
श्लोकार्थः — [वस्तु] एक वस्तु [स्वयम् परिणामिनः अन्य-वस्तुनः] स्वयं परिणमती अन्य वस्तुने [किञ्चन अपि कुरुते] कांई पण करी शके छे — [यत् तु] एम जे मानवामां आवे छे, [तत् व्यावहारिक- द्रशा एव मतम्] ते व्यवहारद्रष्टिथी ज मानवामां आवे छे. [निश्चयात्] निश्चयथी [इह अन्यत् किम् अपि न अस्ति] आ लोकमां अन्य वस्तुने अन्य वस्तु कांई पण नथी (अर्थात् एक वस्तुने अन्य वस्तु साथे कांई पण संबंध नथी).
भावार्थः — एक द्रव्यना परिणमनमां अन्य द्रव्य निमित्त देखीने एम कहेवुं के ‘अन्य द्रव्ये आ कर्युं’, ते व्यवहारनयनी द्रष्टिथी ज छे; निश्चयथी तो ते द्रव्यमां अन्य द्रव्ये कांई कर्युं नथी. वस्तुना पर्यायस्वभावने लीधे वस्तुनुं पोतानुं ज एक अवस्थाथी बीजी अवस्थारूप परिणमन थाय छे; तेमां अन्य वस्तु पोतानुं कांई भेळवी शकती नथी.
आ उपरथी एम समजवुं के — परद्रव्यरूप ज्ञेय पदार्थो तेमना भावे परिणमे छे अने ज्ञायक आत्मा पोताना भावे परिणमे छे; तेओ एकबीजाने परस्पर कांई करी शकता नथी. माटे ‘ज्ञायक परद्रव्योने जाणे छे’ एम व्यवहारथी ज मानवामां आवे छे; निश्चयथी ज्ञायक तो बस ज्ञायक ज छे. २१४.
(‘खडी तो खडी ज छे’ — ए निश्चय छे; ‘खडी-स्वभावे परिणमती खडी भींत-स्वभावे परिणमती भींतने सफेद करे छे’ एम कहेवुं ते पण व्यवहारकथन छे. तेवी रीते ‘ज्ञायक तो ज्ञायक ज छे’ — ए निश्चय छे; ‘ज्ञायकस्वभावे परिणमतो ज्ञायक परद्रव्यस्वभावे परिणमतां एवां परद्रव्योने जाणे छे’ एम कहेवुं ते पण व्यवहारकथन छे.) आवा निश्चय-व्यवहार कथनने हवे गाथाओमां द्रष्टांत द्वारा स्पष्ट कहे छेः —
५०२