गाथार्थः — [दर्शनज्ञानचारित्रम्] दर्शन-ज्ञान-चारित्र [अचेतने विषये तु] अचेतन विषयमां [किञ्चित् अपि] जरा पण [न अस्ति] नथी, [तस्मात्] तेथी [चेतयिता] आत्मा [तेषु विषयेषु] ते विषयोमां [किं हन्ति] शुं हणे (अर्थात् शानो घात करी शके)?
[दर्शनज्ञानचारित्रम्] दर्शन-ज्ञान-चारित्र [अचेतने कर्मणि तु] अचेतन कर्ममां [किञ्चित् अपि] जरा पण [न अस्ति] नथी, [तस्मात्] तेथी [चेतयिता] आत्मा [तत्र कर्मणि] ते कर्ममां [किं हन्ति] शुं हणे? (कांई हणी शकतो नथी.)
[दर्शनज्ञानचारित्रम्] दर्शन-ज्ञान-चारित्र [अचेतने काये तु] अचेतन कायामां [किञ्चित् अपि] जरा पण [न अस्ति] नथी, [तस्मात्] तेथी [चेतयिता] आत्मा [तेषु कायेषु] ते कायाओमां [किं हन्ति] शुं हणे? (कांई हणी शकतो नथी.)
[ज्ञानस्य] ज्ञाननो, [दर्शनस्य च] दर्शननो [तथा चारित्रस्य] तथा चारित्रनो [घातः भणितः] घात कह्यो छे, [तत्र] त्यां [पुद्गलद्रव्यस्य] पुद्गलद्रव्यनो [घातः तु] घात [कः अपि] जरा पण [न अपि निर्दिष्टः] कह्यो नथी. (दर्शन-ज्ञान-चारित्र हणातां पुद्गलद्रव्य हणातुं नथी.)
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