Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-

घातस्य, पुद्गलद्रव्यघाते तद्घातस्य दुर्निवारत्वात् यत एवं ततो ये यावन्तः केचनापि जीवगुणास्ते सर्वेऽपि परद्रव्येषु न सन्तीति सम्यक् पश्यामः, अन्यथा अत्रापि जीवगुणघाते पुद्गलद्रव्यघातस्य, पुद्गलद्रव्यघाते जीवगुणघातस्य च दुर्निवारत्वात् यद्येवं तर्हि कुतः सम्यग्द्रष्टेर्भवति रागो विषयेषु ? न कुतोऽपि तर्हि रागस्य कतरा खानिः ? रागद्वेषमोहा हि जीवस्यैवाज्ञानमयाः परिणामाः, ततः परद्रव्यत्वाद्विषयेषु न सन्ति, अज्ञानाभावात्सम्यग्द्रष्टौ तु न भवन्ति एवं ते विषयेष्वसन्तः सम्यग्द्रष्टेर्न भवन्तो, न भवन्त्येव (ए तो स्पष्ट छे); माटे ए रीते ‘दर्शन-ज्ञान-चारित्र पुद्गलद्रव्यमां नथी’ एम फलित (सिद्ध) थाय छे; कारण के, जो एम न होय तो दर्शन-ज्ञान-चारित्रनो घात थतां पुद्गलद्रव्यनो घात, अने पुद्गलद्रव्यनो घात थतां दर्शन-ज्ञान-चारित्रनो घात अनिवार्य थाय (अर्थात् अवश्य थवो


जोईए). आम छे तेथी जे कोई जेटला जीवना गुणो छे ते बधाय परद्रव्योमां नथी एम अमे सम्यक् प्रकारे देखीए छीए (मानीए छीए); कारण के, जो एम न होय तो, अहीं पण जीवना गुणोनो घात थतां पुद्गलद्रव्यनो घात, अने पुद्गलद्रव्यनो घात थतां जीवना गुणोनो घात अनिवार्य थाय. (आ रीते सिद्ध थयुं के जीवना कोई गुणो पुद्गलद्रव्यमां नथी.)

(प्रश्नः-) जो आम छे तो सम्यग्द्रष्टिने विषयोमां राग कया कारणे थाय छे? (उत्तरः-) कोई पण कारणे थतो नथी. (प्रश्नः) तो पछी रागनी कई खाण छे? (उत्तरः-) राग-द्वेष-मोह, जीवना ज अज्ञानमय परिणाम छे (अर्थात् जीवनुं अज्ञान ज रागादिक ऊपजवानी खाण छे); माटे ते रागद्वेषमोह, विषयोमां नथी कारण के विषयो परद्रव्य छे, अने सम्यग्द्रष्टिमां (पण) नथी कारण के तेने अज्ञाननो अभाव छे; आ रीते रागद्वेषमोह, विषयोमां नहि होवाथी अने सम्यग्द्रष्टिने (पण) नहि होवाथी, (तेओ) छे ज नहि.

भावार्थःआत्माने अज्ञानमय परिणामरूप रागद्वेषमोह उत्पन्न थतां आत्माना दर्शन-ज्ञान-चारित्रादि गुणो हणाय छे, परंतु ते गुणो हणातां छतां अचेतन पुद्गलद्रव्य हणातुं नथी; वळी पुद्गलद्रव्य हणातां दर्शन-ज्ञान-चारित्रादि हणातां नथी; माटे जीवना कोई गुणो पुद्गलद्रव्यमां नथी. आवुं जाणता सम्यग्द्रष्टिने अचेतन विषयोमां रागादि थता नथी. राग- द्वेषमोह पुद्गलद्रव्यमां नथी, जीवना ज अस्तित्वमां अज्ञानथी ऊपजे छे; ज्यारे अज्ञाननो अभाव थाय अर्थात

् सम्यग्द्रष्टि थाय त्यारे तेओ ऊपजता नथी. आ रीते रागद्वेषमोह

पुद्गलमां नथी तेम ज सम्यग्द्रष्टिमां पण नथी, तेथी शुद्धद्रव्यद्रष्टिथी जोतां तेओ छे ज नहि. पर्यायद्रष्टिथी जोतां जीवने अज्ञान-अवस्थामां तेओ छे. ए प्रमाणे जाणवुं.

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