Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 372.

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समयसार
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अण्णदविएण अण्णदवियस्स णो कीरए गुणुप्पाओ
तम्हा दु सव्वदव्वा उप्पज्जंते सहावेण ।।३७२।।
अन्यद्रव्येणान्यद्रव्यस्य न क्रियते गुणोत्पादः
तस्मात्तु सर्वद्रव्याण्युत्पद्यन्ते स्वभावेन ।।३७२।।

न च जीवस्य परद्रव्यं रागादीनुत्पादयतीति शङ्कयम्; अन्यद्रव्येणान्यद्रव्यगुणोत्पाद- करणस्यायोगात्; सर्वद्रव्याणां स्वभावेनैवोत्पादात् तथाहिमृत्तिका कुम्भभावेनोत्पद्यमाना किं कुम्भकारस्वभावेनोत्पद्यते, किं मृत्तिकास्वभावेन ? यदि कुम्भकारस्वभावेनोत्पद्यते तदा कुम्भकरणाहङ्कारनिर्भरपुरुषाधिष्ठितव्यापृतकरपुरुषशरीराकारः कुम्भः स्यात् न च तथास्ति, --

भावार्थःरागद्वेष चेतनना ज परिणाम छे. अन्य द्रव्य आत्माने रागद्वेष उपजावी शकतुं नथी; कारण के सर्व द्रव्योनी उत्पत्ति पोतपोताना स्वभावथी ज थाय छे, अन्य द्रव्यमां अन्य द्रव्यना गुणपर्यायोनी उत्पत्ति थती नथी. २१९.

हवे आ अर्थने गाथामां कहे छेः

को द्रव्य बीजा द्रव्यने उत्पाद नहि गुणनो करे,
तेथी बधांये द्रव्य निज स्वभावथी ऊपजे खरे. ३७२.

गाथार्थः[अन्यद्रव्येण] अन्य द्रव्यथी [अन्यद्रव्यस्य] अन्य द्रव्यने [गुणोत्पादः] गुणनी उत्पत्ति [न क्रियते] करी शकाती नथी; [तस्मात् तु] तेथी (ए सिद्धांत छे के) [सर्वद्रव्याणि] सर्व द्रव्यो [स्वभावेन] पोतपोताना स्वभावथी [उत्पद्यन्ते] ऊपजे छे.

टीकाःवळी जीवने परद्रव्य रागादिक उपजावे छे एम शंका न करवी; कारण के अन्य द्रव्य वडे अन्य द्रव्यना गुणनो उत्पाद करावानी अयोग्यता छे; केम के सर्व द्रव्योनो स्वभावथी ज उत्पाद थाय छे. आ वात द्रष्टांतथी समजाववामां आवे छेः

माटी कुंभभावे (घडा-भावे) ऊपजती थकी शुं कुंभारना स्वभावथी ऊपजे छे के माटीना स्वभावथी ऊपजे छे? जो कुंभारना स्वभावथी ऊपजती होय तो जेमां घडो करवाना अहंकारथी भरेलो पुरुष रहेलो छे अने जेनो हाथ (घडो करवानो) व्यापार करे छे एवुं जे पुरुषनुं शरीर तेना आकारे घडो थवो जोईए. परंतु एम तो थतुं नथी, कारण के अन्यद्रव्यना स्वभावे कोई द्रव्यना परिणामनो उत्पाद जोवामां आवतो नथी. जो आम छे

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