कहानजैनशास्त्रमाळा ]
द्रव्यमेव कलयन्ति ये तु ते ।
शुद्धबोधविधुरान्धबुद्धयः ।।२२१।।
हवे आ ज अर्थ द्रढ करवाने अने आगळना कथननी सूचना करवाने काव्य कहे छेः —
श्लोकार्थः — [ये तु राग-जन्मनि परद्रव्यम् एव निमित्ततां कलयन्ति] जेओ रागनी उत्पत्तिमां परद्रव्यनुं ज निमित्तपणुं (कारणपणुं) माने छे, (पोतानुं कांई कारणपणुं मानता नथी,) [ते शुद्ध-बोध-विधुर-अन्ध-बुद्धयः] तेओ — जेमनी बुद्धि शुद्धज्ञानरहित अंध छे एवा (अर्थात् जेमनी बुद्धि शुद्धनयना विषयभूत शुद्ध आत्मस्वरूपना ज्ञानथी रहित अंध छे एवा) — [मोह-वाहिनीं न हि उत्तरन्ति] मोहनदीने ऊतरी शकता नथी.
भावार्थः — शुद्धनयनो विषय आत्मा अनंत शक्तिवाळो, चैतन्यचमत्कारमात्र, नित्य, अभेद, एक छे. ते पोताना ज अपराधथी रागद्वेषरूपे परिणमे छे. एवुं नथी के जेम निमित्तभूत परद्रव्य परिणमावे तेम आत्मा परिणमे छे अने तेमां आत्मानो कांई पुरुषार्थ ज नथी. आवुं आत्माना स्वरूपनुं ज्ञान जेमने नथी तेओ एम माने छे के परद्रव्य आत्माने जेम परिणमावे तेम आत्मा परिणमे छे. आवुं माननारा मोहरूपी नदीने ऊतरी शकता नथी (अथवा मोहनी सेनाने हरावी शकता नथी), तेमने रागद्वेष मटता नथी; कारण के रागद्वेष करवामां जो पोतानो पुरुषार्थ होय तो ज तेमने मटाडवामां पण होय, परंतु जो परना कराव्या ज रागद्वेष थता होय तो पर तो रागद्वेष कराव्या ज करे, त्यां आत्मा तेमने क्यांथी मटाडी शके? माटे, रागद्वेष पोताना कर्या थाय छे अने पोताना मटाड्या मटे छे — एम कथंचित
मानवुं ते सम्यग्ज्ञान छे. २२१.
स्पर्श, रस, गंध, वर्ण अने शब्दादिरूपे परिणमतां पुद्गलो आत्माने कांई कहेतां नथी के ‘तु अमने जाण’, अने आत्मा पण पोताना स्थानथी छूटीने तेमने जाणवा जतो नथी. बन्ने तद्दन स्वतंत्रपणे पोतपोताना स्वभावथी ज परिणमे छे. आम आत्मा पर प्रत्ये उदासीन ( – संबंध विनानो, तटस्थ) छे, तोपण अज्ञानी जीव स्पर्शादिकने सारां-नरसां मानीने रागीद्वेषी थाय छे ते तेनुं अज्ञान छे. — आवा अर्थनी गाथाओ हवे कहे छेः —