कहानजैनशास्त्रमाळा ]
ये खलु श्रमणोऽहं श्रमणोपासकोऽहमिति द्रव्यलिङ्गममकारेण मिथ्याहङ्कारं कुर्वन्ति, तेऽनादिरूढव्यवहारमूढाः प्रौढविवेकं निश्चयमनारूढाः परमार्थसत्यं भगवन्तं समयसारं न पश्यन्ति ।
हवे आ अर्थनी गाथा कहे छेः —
गाथार्थः — [ये] जेओ [बहुप्रकारेषु] बहु प्रकारनां [पाषण्डिलिङ्गेषु वा] मुनिलिंगोमां [गृहिलिङ्गेषु वा] अथवा गृहस्थलिंगोमां [ममत्वं कुर्वन्ति] ममता करे छे (अर्थात् आ द्रव्यलिंग ज मोक्षनुं देनार छे एम माने छे), [तैः समयसारः न ज्ञातः] तेमणे समयसारने नथी जाण्यो.
टीकाः — जेओ खरेखर ‘हुं श्रमण छुं, हुं श्रमणोपासक ( – श्रावक) छुं’ एम द्रव्यलिंगमां ममकार वडे मिथ्या अहंकार करे छे, तेओ अनादिरूढ (अनादि काळथी चाल्या आवेला) व्यवहारमां मूढ (मोही) वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय ( – निश्चयनय) पर १अनारूढ वर्तता थका, परमार्थसत्य ( – जे परमार्थे सत्यार्थ छे एवा) भगवान समयसारने देखता – अनुभवता नथी.
भावार्थः — अनादि काळनो परद्रव्यना संयोगथी थयेलो जे व्यवहार तेमां ज जे पुरुषो मूढ अर्थात् मोहित छे, तेओ एम माने छे के ‘आ बाह्य महाव्रतादिरूप भेख छे ते ज अमने मोक्ष प्राप्त करावशे’, परंतु जेनाथी भेदज्ञान थाय छे एवा निश्चयने तेओ जाणता नथी. आवा पुुरुषो सत्यार्थ, परमात्मरूप, शुद्धज्ञानमय समयसारने देखता नथी.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः —
१. अनारूढ = नहि आरूढ; नहि चडेला.