Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 413.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

सर्वविशुद्धज्ञान अधिकार
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पासंडीलिंगेसु व गिहिलिंगेसु व बहुप्पयारेसु
कुव्वंति जे ममत्तिं तेहिं ण णादं समयसारं ।।४१३।।
पाषण्डिलिङ्गेषु वा गृहिलिङ्गेषु वा बहुप्रकारेषु
कुर्वन्ति ये ममत्वं तैर्न ज्ञातः समयसारः ।।४१३।।

ये खलु श्रमणोऽहं श्रमणोपासकोऽहमिति द्रव्यलिङ्गममकारेण मिथ्याहङ्कारं कुर्वन्ति, तेऽनादिरूढव्यवहारमूढाः प्रौढविवेकं निश्चयमनारूढाः परमार्थसत्यं भगवन्तं समयसारं न पश्यन्ति

हवे आ अर्थनी गाथा कहे छेः

बहुविधनां मुनिलिंगमां अथवा गृहीलिंगो विषे
ममता करे, तेणे नथी जाण्यो ‘समयना सार’ने. ४१३.

गाथार्थः[ये] जेओ [बहुप्रकारेषु] बहु प्रकारनां [पाषण्डिलिङ्गेषु वा] मुनिलिंगोमां [गृहिलिङ्गेषु वा] अथवा गृहस्थलिंगोमां [ममत्वं कुर्वन्ति] ममता करे छे (अर्थात् आ द्रव्यलिंग ज मोक्षनुं देनार छे एम माने छे), [तैः समयसारः न ज्ञातः] तेमणे समयसारने नथी जाण्यो.

टीकाःजेओ खरेखर ‘हुं श्रमण छुं, हुं श्रमणोपासक (श्रावक) छुं’ एम द्रव्यलिंगमां ममकार वडे मिथ्या अहंकार करे छे, तेओ अनादिरूढ (अनादि काळथी चाल्या आवेला) व्यवहारमां मूढ (मोही) वर्तता थका, प्रौढ विवेकवाळा निश्चय (निश्चयनय) पर अनारूढ वर्तता थका, परमार्थसत्य (जे परमार्थे सत्यार्थ छे एवा) भगवान समयसारने देखताअनुभवता नथी.

भावार्थःअनादि काळनो परद्रव्यना संयोगथी थयेलो जे व्यवहार तेमां ज जे पुरुषो मूढ अर्थात् मोहित छे, तेओ एम माने छे के ‘आ बाह्य महाव्रतादिरूप भेख छे ते ज अमने मोक्ष प्राप्त करावशे’, परंतु जेनाथी भेदज्ञान थाय छे एवा निश्चयने तेओ जाणता नथी. आवा पुुरुषो सत्यार्थ, परमात्मरूप, शुद्धज्ञानमय समयसारने देखता नथी.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः

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१. अनारूढ = नहि आरूढ; नहि चडेला.