कहानजैनशास्त्रमाळा ]
यः खलु श्रमणश्रमणोपासकभेदेन द्विविधं द्रव्यलिङ्गं भवति मोक्षमार्ग इति प्ररूपणप्रकारः स केवलं व्यवहार एव, न परमार्थः, तस्य स्वयमशुद्धद्रव्यानुभवनात्मकत्वे सति परमार्थत्वा- भावात्; यदेव श्रमणश्रमणोपासकविकल्पातिक्रान्तं द्रशिज्ञप्तिप्रवृत्तवृत्तिमात्रं शुद्धज्ञानमेवैकमिति निस्तुषसञ्चेतनं परमार्थः, तस्यैव स्वयं शुद्धद्रव्यानुभवनात्मकत्वे सति परमार्थत्वात् । ततो ये व्यवहारमेव परमार्थबुद्धया चेतयन्ते, ते समयसारमेव न सञ्चेतयन्ते; य एव परमार्थं परमार्थबुद्धया
‘व्यवहारनय ज मुनिलिंगने अने श्रावकलिंगने — ए बन्ने लिंगोने मोक्षमार्ग कहे छे, निश्चयनय कोई लिंगने मोक्षमार्ग कहेतो नथी’ — एम हवे गाथामां कहे छेः —
गाथार्थः — [व्यावहारिकः नयः पुनः] व्यवहारनय [द्वे लिङ्गे अपि] बन्ने लिंगोने [मोक्षपथे भणति] मोक्षमार्गमां कहे छे (अर्थात् व्यवहारनय मुनिलिंग तेम ज गृहीलिंगने मोक्षमार्ग कहे छे); [निश्चयनयः] निश्चयनय [सर्वलिङ्गानि] सर्व लिंगोने (अर्थात् कोई पण लिंगने) [मोक्षपथे न इच्छति] मोक्षमार्गमां गणतो नथी.
टीकाः — श्रमण अने श्रमणोपासकना भेदे बे प्रकारनां द्रव्यलिंगो मोक्षमार्ग छे — एवो जे प्ररूपण - प्रकार (अर्थात् एवा प्रकारनी जे प्ररूपणा) ते केवळ व्यवहार ज छे, परमार्थ नथी, कारण के ते (प्ररूपणा) पोते अशुद्ध द्रव्यना अनुभवनस्वरूप होवाथी तेने परमार्थपणानो अभाव छे; श्रमण अने श्रमणोपासकना भेदोथी अतिक्रांत, दर्शनज्ञानमां प्रवृत्त परिणतिमात्र ( – मात्र दर्शन - ज्ञानमां प्रवर्तेली परिणतिरूप) शुद्ध ज्ञान ज एक छे — एवुं जे निस्तुष ( – निर्मळ) अनुभवन ते परमार्थ छे, कारण के ते (अनुभवन) पोते शुद्ध द्रव्यना अनुभवन- स्वरूप होवाथी तेने ज परमार्थपणुं छे. माटे जेओ व्यवहारने ज परमार्थबुद्धिथी ( – परमार्थ मानीने) अनुभवे छे, तेओ समयसारने ज नथी अनुभवता; जेओ परमार्थने परमार्थबुद्धिथी