Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 273.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

परिशिष्ट
६२३
(पृथ्वी)
इतो गतमनेकतां दधदितः सदाप्येकता-
मितः क्षणविभङ्गुरं ध्रुवमितः सदैवोदयात्
इतः परमविस्तृतं धृतमितः प्रदेशैर्निजै-
रहो सहजमात्मनस्तदिदमद्भुतं वैभवम्
।।२७३।।

निमित्तथी अनेकाकार अनुभवाय छे, कोई अवस्थामां शुद्ध एकाकार अनुभवाय छे अने कोई अवस्थामां शुद्धाशुद्ध अनुभवाय छे; तोपण यथार्थ ज्ञानी स्याद्वादना बळथी भ्रमित थतो नथी, जेवुं छे तेवुं ज माने छे, ज्ञानमात्रथी च्युत थतो नथी. २७२.

आत्मानो अनेकांतस्वरूप (अनेक धर्मस्वरूप) वैभव अद्भुत (आश्चर्यकारक) छे एवा अर्थनुं काव्य हवे कहे छेः

श्लोकार्थः[अहो आत्मनः तद् इदम् सहजम् अद्भुतं वैभवम्] अहो! आत्मानो ते आ सहज अद्भुत वैभव छे के[इतः अनेकतां गतम्] एक तरफथी जोतां ते अनेकताने पामेलो छे अने [इतः सदा अपि एकताम् दधत्] एक तरफथी जोतां सदाय एकताने धारण करे छे, [इतः क्षणविभङ्गुरम्] एक तरफथी जोतां क्षणभंगुर छे अने [इतः सदा एव उदयात् ध्रुवम्] एक तरफथी जोतां सदाय तेनो उदय होवाथी ध्रुव छे, [इतः परम - विस्तृतम्] एक तरफथी जोतां परम विस्तृत छे अने [इतः निजैः प्रदेशैः धृतम्] एक तरफथी जोतां पोताना प्रदेशोथी ज धारण करी रखायेलो छे.

भावार्थःपर्यायद्रष्टिथी जोतां आत्मा अनेकरूप देखाय छे अने द्रव्यद्रष्टिथी जोतां एकरूप देखाय छे; क्रमभावी पर्यायद्रष्टिथी जोतां क्षणभंगुर देखाय छे अने सहभावी गुणद्रष्टिथी जोतां ध्रुव देखाय छे; ज्ञाननी अपेक्षावाळी सर्वगत द्रष्टिथी जोतां परम विस्तारने पामेलो देखाय छे अने प्रदेशोनी अपेक्षावाळी द्रष्टिथी जोतां पोताना प्रदेशोमां ज व्यापेलो देखाय छे. आवो द्रव्यपर्यायात्मक अनंतधर्मवाळो वस्तुनो स्वभाव छे. ते (स्वभाव) अज्ञानीओना ज्ञानमां आश्चर्य उपजावे छे के आ तो असंभवित जेवी वात छे! ज्ञानीओने जोके वस्तुस्वभावमां आश्चर्य नथी तोपण तेमने पूर्वे कदी नहोतो थयो एवो अद्भुत परम आनंद थाय छे, अने तेथी आश्चर्य पण थाय छे. २७३.

फरी आ ज अर्थनुं काव्य कहे छेः