Samaysar-Gujarati (Devanagari transliteration). Kalash: 276.

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कहानजैनशास्त्रमाळा ]

परिशिष्ट
६२५
(मालिनी)
अविचलितचिदात्मन्यात्मनात्मानमात्म-
न्यनवरतनिमग्नं धारयद् ध्वस्तमोहम्
उदितममृतचन्द्रज्योतिरेतत्समन्ता-
ज्ज्वलतु विमलपूर्णं निःसपत्नस्वभावम्
।।२७६।।

झळकता होवाथी जे अनेक ज्ञेयाकाररूप देखाय छे तोपण चैतन्यरूप ज्ञानाकारनी द्रष्टिमां जे एकस्वरूप ज छे), [स्व - रस - विसर-पूर्ण - अच्छिन्न - तत्त्व - उपलम्भः] जेमां निज रसना फेलावथी पूर्ण अछिन्न तत्त्व - उपलब्धि छे (अर्थात् प्रतिपक्षी कर्मनो अभाव थयो होवाथी जेमां स्वरूप - अनुभवननो अभाव थतो नथी) अने [प्रसभ - नियमित - अर्चिः] अत्यंत नियमित जेनी ज्योत छे (अर्थात् अनंत वीर्यथी जे निष्कंप रहे छे) [एषः चित् - चमत्कारः जयति] एवो आ (प्रत्यक्ष अनुभवगोचर) चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे (कोईथी बाधित न करी शकाय एम सर्वोत्कृष्टपणे वर्ते छे).

(अहीं ‘चैतन्यचमत्कार जयवंत वर्ते छे’ एम कहेवामां जे चैतन्यचमत्कारनुं सर्वोत्कृष्टपणे वर्तवुं बताव्युं, ते ज मंगळ छे.) २७५.

हवेना काव्यमां टीकाकार आचार्यदेव पूर्वोक्त आत्माने आशीर्वाद आपे छे अने साथे साथे पोतानुं नाम पण प्रगट करे छेः

श्लोकार्थः[अविचलित - चिदात्मनि आत्मनि आत्मानम् आत्मना अनवरत - निमग्नं धारयत्] जे अचळ - चेतनास्वरूप आत्मामां आत्माने पोताथी ज अनवरतपणे (निरंतर) निमग्न राखे छे (अर्थात् प्राप्त करेला स्वभावने कदी छोडती नथी), [ध्वस्त - मोहम्] जेणे मोहनो (अज्ञान -अंधकारनो) नाश कर्यो छे, [निःसपत्नस्वभावम्] जेनो स्वभाव निःसपत्न (अर्थात् प्रतिपक्षी कर्मो विनानो) छे, [विमल - पूर्णं] जे निर्मळ छे अने जे पूर्ण छे एवी [एतत् उदितम् अमृतचन्द्र - ज्योतिः] आ उदय पामेली अमृतचंद्रज्योति (अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति, ज्ञान, आत्मा) [समन्तात् ज्वलतु] सर्व तरफथी जाज्वल्यमान रहो.

भावार्थःजेनुं मरण नथी तथा जेनाथी अन्यनुं मरण नथी ते अमृत छे; वळी जे अत्यंत स्वादिष्ट (मीठुं) होय तेने लोको रूढिथी अमृत कहे छे. अहीं ज्ञाननेआत्माने अमृतचंद्रज्योति (अर्थात् अमृतमय चंद्रमा समान ज्योति) कहेल छे, ते लुप्तोपमा अलंकारथी कह्युं जाणवुं; कारण के ‘अमृतचन्द्रवत् ज्योतिः’नो समास करतां ‘वत्’नो लोप थई ‘अमृतचन्द्रज्योतिः’ थाय छे.

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