कहानजैनशास्त्रमाळा ]
परिशिष्ट
६२९
तेमने विपरीत श्रद्धान थतुं नथी. क्यांक अर्थनुं अन्यथा समजवुं पण थई जाय तो विशेष बुद्धिमाननुं निमित्त मळ्ये यथार्थ थई जाय छे. जिनमतनी श्रद्धावाळाओ हठग्राही होता नथी.
हवे अंतमंगळने अर्थे पंच परमेष्ठीने नमस्कार करी शास्त्र समाप्त करीए छीएः —
मंगल श्री अरहंत घातिया कर्म निवारे,
मंगल सिद्ध महंत कर्म आठों परजारे;
आचारज उवज्झाय मुनि मंगलमय सारे,
दीक्षा शिक्षा देय भव्यजीवनिकूं तारे;
मंगल सिद्ध महंत कर्म आठों परजारे;
आचारज उवज्झाय मुनि मंगलमय सारे,
दीक्षा शिक्षा देय भव्यजीवनिकूं तारे;
अठवीस मूलगुण धार जे सर्वसाधु अणगार हैं,
मैं नमुं पंचगुरुचरणकूं मंगल हेतु करार हैं. १.
जैपुर नगरमांहि तेरापंथ शैली बडी
बडे बडे गुनी जहां पढै ग्रंथ सार है,
जयचंद्र नाम मैं हूं तिनिमें अभ्यास किछू
कियो बुद्धिसारु धर्मरागतें विचार है;
समयसार ग्रंथ ताकी देशके वचनरूप
भाषा करी पढो सुनूं करो निरधार है,
आपापर भेद जानि हेय त्यागि उपादेय
गहो शुद्ध आतमकूं, यहै बात सार है. २.
संवत्सर विक्रम तणूं, अष्टादश शत और;
चौसठि कातिक वदि दशै, पूरण ग्रंथ सुठौर. ३.
आम श्रीमद्भगवत्कुंदकुंदाचार्यदेवप्रणीत समयप्राभृत नामना प्राकृतगाथाबद्ध परमागमनी श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित आत्मख्याति नामनी संस्कृत टीका अनुसार पंडित जयचंद्रजीकृत संक्षेपभावार्थमात्र देशभाषामय वचनिकाना आधारे श्री हिंमतलाल जेठालाल शाह कृत गुजराती अनुवाद समाप्त थयो.
समाप्त